तुलनात्मक धर्म से बड़ा उपकार होता है – स्वामी मुक्तिनाथानंद

जिसका जैसा मन है वह ईश्वर को इस तरह देखता है : स्वामी मुक्तिनाथानंद
बृहस्पतिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि मनुष्य की जिज्ञासा केवल बाहरी संसार को जानने तक सीमित नहीं है। वह अपने अस्तित्व, चेतना और उस परम सत्ता को भी जानना चाहता है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। आध्यात्मिक साधना और वैज्ञानिक जिज्ञासा देखने में अलग-अलग क्षेत्र लगते हैं, किंतु दोनों का मूल उद्देश्य सत्य की खोज ही है। आध्यात्मिक शरीर-विज्ञान, मन के नियंत्रण, विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन तथा व्यक्तिगत अनुभूति के माध्यम से इसी सत्य की खोज को समझना आवश्यक है।
स्वामी जी ने बताया कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शरीर को केवल भौतिक संरचना नहीं माना गया, बल्कि उसे चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम भी माना गया है। इसी संदर्भ में सुषुम्ना नाड़ी और कुण्डलिनी शक्ति* की चर्चा आती है। आध्यात्मिक साधना में मन को एकाग्र और नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। मन जब विषयों की ओर निरंतर भागता रहता है, तब व्यक्ति अपने भीतर की शांति को अनुभव नहीं कर पाता। इसलिए साधना का उद्देश्य मन को धीरे-धीरे स्थिर करके चेतना के गहरे स्तरों की ओर ले जाना है।
स्वामी जी ने आगे कहा कि भारतीय दर्शन में सत्त्व, रजस् और तमस् तीन गुणों का वर्णन मिलता है*। ये तीनों गुण मनुष्य के विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि को प्रभावित करते हैं। आध्यात्मिक उन्नति का अर्थ केवल सत्त्व की वृद्धि करना ही नहीं, बल्कि अंततः तीनों गुणों की सीमाओं से ऊपर उठना है। जब मन इन गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर संतुलित और शांत होता है, तब ध्यान के लिए अनुकूल अवस्था उत्पन्न होती है। इस अवस्था में साधक अपने भीतर की चेतना को अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव कर सकता है। *धर्म और विज्ञान के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष तुलनात्मक अध्ययन है। जिस प्रकार विज्ञान विभिन्न घटनाओं का विश्लेषण करके उनके पीछे छिपे नियमों को समझने का प्रयास करता है, उसी प्रकार विभिन्न धार्मिक परंपराओं का अध्ययन मनुष्य को आध्यात्मिक सत्य के अनेक मार्गों को समझने में सहायता देता है। *मधुमक्खी जिस प्रकार अनेक फूलों से रस एकत्र करके मधु बनाती है, उसी प्रकार साधक विभिन्न धर्मों और साधना-पद्धतियों से उनके सार को ग्रहण कर सकता है।* इससे संकीर्णता समाप्त होती है और सत्य के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित होता है।
*स्वामी जी ने समझाया कि श्रीरामकृष्ण परमहंस का जीवन इस दृष्टि से अत्यंत प्रेरणादायक है*। उन्होंने विभिन्न धार्मिक मार्गों की साधना करके उनके सत्य को अपने अनुभव में परखने का प्रयास किया। इससे यह संदेश मिलता है कि धर्म केवल सिद्धांत, पुस्तक या बौद्धिक चर्चा का विषय नहीं है। उसका वास्तविक उद्देश्य जीवन में सत्य की अनुभूति कराना है। *ईश्वर के अनुभव के तीन प्रमुख आधार माने जा सकते हैं—शास्त्र प्रमाण, अनुभव प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाण।* शास्त्र हमें मार्ग दिखाते हैं और महान संतों के अनुभवों से परिचित कराते हैं। दूसरे लोगों के अनुभव हमें प्रेरणा देते हैं, लेकिन अंततः साधक के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उसका अपना अनुभव। जिस सत्य को स्वयं अनुभव किया जाता है, उसके प्रति विश्वास अधिक गहरा और स्थायी हो जाता है। *श्रीरामकृष्ण का प्रसिद्ध कथन है—“जिसका जैसा मन है, वह उसको उसी तरह देखता है।*” इसका अर्थ है कि ईश्वर की अनुभूति साधक की अंतःस्थिति से गहराई से जुड़ी होती है। ईश्वर मन और विचार की सामान्य सीमाओं से परे हैं; इसलिए केवल तर्क से उन्हें पूरी तरह समझ पाना कठिन है। इसके लिए मन की शुद्धि, एकाग्रता, ध्यान और निरंतर साधना आवश्यक है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल किसी सिद्धांत को स्वीकार करना नहीं बल्कि सत्य को अपने जीवन में अनुभव करना है। वैज्ञानिक दृष्टि हमें प्रश्न करना और सत्य को परखना सिखाती है, जबकि आध्यात्मिक साधना हमें अपने भीतर उतरकर उस सत्य का अनुभव करने का मार्ग देती है। जब विवेक, साधना, तुलनात्मक दृष्टि और व्यक्तिगत अनुभूति एक साथ आते हैं, तब मनुष्य के भीतर वास्तविक आध्यात्मिक जागरण संभव होता है। यही जागरण जीवन को शांति, प्रेम, व्यापकता और सत्य की दिशा प्रदान करता है।



