
मंगलवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर और भक्त के बीच प्रेम के संबंध है. डॉ. महेन्द्रलाल सरकार एक बहुत बड़े डॉक्टर थे, जो श्रीरामकृष्ण परमहंस के चिकित्सक थे। शुरू में उनका संबंध एक डॉक्टर और मरीज का ही था। वे तर्कवादी थे, ईश्वर-भक्ति को बहुत नहीं मानते थे।
लेकिन श्रीरामकृष्ण के साथ रहते-रहते उनके मन में उस संत के प्रति सच्चा, गहरा प्रेम पैदा हो गया। यह प्रेम उनकी प्रोफेशनल ड्यूटी से कहीं ऊपर उठ गया। वे अब केवल डॉक्टर नहीं रहे, वे भक्त बन गए। वे घंटों श्रीरामकृष्ण के पास बैठे रहते, उनकी चिंता करते, उनके लिए रोते। यह घटना बताती है कि भक्ति कैसे एक नास्तिक या तर्कशील व्यक्ति के दिल को भी पिघला देती है। ईश्वरीय प्रेम में इतनी शक्ति है कि वह बड़े-बड़े अहंकार को तोड़ देता है।
स्वामी जी ने बताया कि दिव्य प्रेम का स्वरूप – भक्ति क्या है? भक्ति कोई बाहरी पूजा-पाठ नहीं है। यह ईश्वर के साथ एक गहरा, निजी संबंध है। जैसे दो प्रेमियों के बीच संबंध होता है, वैसे ही भक्त और भगवान के बीच। सच्चे प्रेम का अर्थ है – पूर्ण समर्पण। अपने मन, बुद्धि, सारे विचार और कर्म ईश्वर को दे देना।
स्वामी जी ने इस दिव्य प्रेम को समझाने के लिए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के एक गीत का सहारा लिया है।टैगोर के गीतों में अहंकार के समर्पण की बात बहुत गहराई से आती है। भक्ति का अर्थ है – ‘मैं’ को मिटा देना। अपना पूरा दिल, अपना अहंकार, अपनी सारी इच्छाएं ईश्वर के चरणों में रख देना। जैसे फूल अपनी सारी सुगंध देवता को अर्पित कर देता है, वैसे ही भक्त अपना हृदय ईश्वर को दे देता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य ईश्वर से प्रेम का रिश्ता बनाना है।हम सारी जिंदगी पैसे, नाम, रिश्तों के पीछे भागते हैं, पर वो सब अस्थायी है। जब जीवन में ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम आ जाता है, तो वही साधारण जीवन एक अर्थपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है। फिर हर काम, हर सांस ईश्वर के लिए हो जाती है। जीवन बोझ नहीं, बल्कि एक मधुर साधना बन जाता है।



