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पुरुष और प्रकृति के संयोग से ही सृष्टि होती है – स्वामी मुक्तिनाथानंद

 

दर्शन का उद्देश्य बुद्धि विलास नहीं बल्कि जीवन का रूपांतरण है – स्वामी जी

  सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद  ने बताया कि भारतीय दर्शन की दो महान धाराओं – सांख्य और वेदांत – के माध्यम से सृष्टि के रहस्य को उजागर किया। यह प्रवचन डॉ. महेंद्रलाल सरकार और श्री रामकृष्ण परमहंस देव के बीच हुई तत्व-चर्चा पर आधारित है, जो जड़-चेतन के भेद से शुरू होकर ब्रह्म की एकता तक जाती है।
स्वामी जी ने कबूतर के जोड़े का मार्मिक दृष्टांत दिया।जैसे नर और मादा कबूतर के बिना नई सृष्टि संभव नहीं, वैसे ही चेतन पुरुष और जड़ प्रकृति के मिलन के बिना यह जगत नहीं बन सकता। पुरुष साक्षी है, निष्क्रिय है, परन्तु चैतन्यमय है। प्रकृति क्रियाशील है, सृजनशील है, परन्तु स्वयं जड़ है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। केवल चेतन से या केवल जड़ से सृष्टि नहीं रची जा सकती।

इस भेद को और स्पष्ट करते हुए स्वामी जी ने दर्पण और सूर्य का उदाहरण दिया। दर्पण स्वयं प्रकाशित नहीं होता, किन्तु सूर्य की किरणों के पड़ने से वह चमक उठता है। ठीक उसी प्रकार हमारा यह शरीर, यह मन, यह बुद्धि – सब जड़ हैं। आत्मा रूपी पुरुष के प्रकाश से ही इनमें चेतना का आभास होता है। प्रकृति, पुरुष के सान्निध्य में ही क्रियाशील प्रतीत होती है। पुरुष के हटते ही प्रकृति फिर जड़ हो जाती है।

स्वामी जी ने कहा कि महर्षि कपिल के सांख्य दर्शन के* अनुसार संपूर्ण दृश्य जगत 24 तत्वों से बना है। मूल प्रकृति से महत् यानी बुद्धि उत्पन्न होती है। बुद्धि से अहंकार, और अहंकार से 16 तत्व प्रकट होते हैं। इनमें मन, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ – श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, घ्राण; पाँच कर्मेंद्रियाँ – वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ, पायु; पाँच तन्मात्राएँ – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध; और पाँच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी सम्मिलित हैं। इस प्रकार प्रकृति, पुरुष के सहयोग से इन 24 तत्वों द्वारा सृष्टि रचती है।

स्वामी जी ने कहा कि यहीं सांख्य और वेदांत में मौलिक अंतर आता है।सांख्य द्वैतवादी दर्शन है। वह पुरुष और प्रकृति को दो शाश्वत, स्वतंत्र और मौलिक तत्व मानता है। उसके अनुसार मोक्ष का अर्थ है पुरुष का प्रकृति से पूर्ण पृथक्करण। इसके विपरीत वेदांत अद्वैत की घोषणा करता है। वेदांत के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। पुरुष और प्रकृति उस एक ब्रह्म की ही दो अभिव्यक्तियाँ हैं। प्रकृति, ब्रह्म की माया-शक्ति है। इस प्रकार वेदांत, सांख्य के विश्लेषण को एकता के सूत्र में पिरो देता है।

स्वामी मुक्तिनाथानंद  ने निष्कर्ष रूप में बताया कि दर्शन का उद्देश्य बुद्धि-विलास नहीं, बल्कि जीवन-रूपांतरण है। सांख्य हमें विवेक देता है – जड़ और चेतन को अलग करके देखना सिखाता है। वेदांत हमें बोध देता है – उस एकता का अनुभव कराता है जहाँ द्वैत मिट जाता है। डॉ. महेंद्रलाल सरकार जैसे तर्कशील वैज्ञानिक से संवाद करते हुए श्री रामकृष्ण ने यही दिखाया कि श्रद्धा और तर्क, भक्ति और ज्ञान, द्वैत और अद्वैत – सब अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। जड़-चेतन का भेद समझकर, माया के पर्दे को हटाकर, उस शाश्वत पुरुष का साक्षात्कार करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है।

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