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कृषि के साथ बागवानी आधारित खेती आज की आवश्यकता – डॉ. विजय वीर सिंह

2 दिवसीय किसान प्रशिक्षण आयोजित

बयाना।राजस्थान की कृषि और बागवानी न केवल किसानों की आजीविका का आधार हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती की रीढ़ भी हैं। विशेष रूप से भरतपुर अंचल में राई–सरसों, गेहूं, बाजरा तथा विविध बागवानी फसलें हजारों किसान परिवारों की आय और रोजगार का प्रमुख स्रोत बनी हुई हैं। बदलते कृषि परिदृश्य में प्राकृतिक खेती के साथ कम लागत में अधिक, गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ उत्पादन प्राप्त करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह बात भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. विजय वीर सिंह ने 07-08 मई 2026 तक आयोजित दो दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि आज के दौर में कृषि को लाभकारी बनाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना अनिवार्य हो गया है। मिट्टी परीक्षण आधारित पोषण प्रबंधन, उन्नत किस्मों का चयन, समय पर बुवाई, कीट–रोग एवं खरपतवार प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक तकनीकों से उत्पादन और गुणवत्ता-दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। उन्होंने किसानों से कृषि के साथ बागवानी तथा अन्य सहायक कृषि गतिविधियों को अपनाकर आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने का भी आह्वान किया।

कार्यक्रम के प्रशिक्षण समन्वयक एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को कृषि एवं बागवानी फसलों की वैज्ञानिक उत्पादन तकनीकों, फसल प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य संरक्षण तथा आधुनिक कृषि पद्धतियों की व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध कराना था। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता तथा टिकाऊ खेती के व्यावहारिक उपायों से भी अवगत कराया गया।

जल संसाधन विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा प्रायोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने किसानों को उन्नत शस्य क्रियाओं, राई–सरसों की उन्नत किस्मों, मृदा परीक्षण, बागवानी फसल प्रबंधन, जैविक खेती तथा एकीकृत कृषि प्रणाली की विस्तृत जानकारी दी। किसानों ने संस्थान की कृषि मशीनरी, तेल एवं बीज प्रसंस्करण इकाइयों, संग्रहालय तथा प्रक्षेत्र फार्म का भ्रमण कर तकनीकों को नजदीक से समझा। इस कार्यक्रम में 35 किसानों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।

इसके साथ ही संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने ग्राम धौरमुई में “मेरा गांव–मेरा गौरव” कार्यक्रम के तहत “खेती में संतुलित उर्वरकों का उपयोग” विषय पर वैज्ञानिक–किसान संवाद आयोजित किया। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मोहनलाल दोतानिया ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दी, जबकि डॉ. ललित कृष्ण मीना ने जिंक, बोरॉन और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की महत्ता समझाई। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुजित ने बताया कि संतुलित उर्वरक प्रबंधन विशेष रूप से तिलहनी फसलों में तेल की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। कार्यक्रम में 100 से अधिक किसानों ने भाग लिया तथा रामसिंह, राकेश गोयल एवं राधाचरण का सहयोग सराहनीय रहा।

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