
ईश्वर अपने भक्त के लिए ‘स्वजन’ के रूप में प्रकट होते हैं – स्वामी मुक्तिनाथानंद
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर प्रातः कालीन सत् प्रसंग रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि यह विचार कि “ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या” वेदांत दर्शन का एक अत्यंत गूढ़ और गहन सिद्धांत है। श्री रामकृष्ण के वचनों के आधार पर इस विषय को सरल और समझने योग्य उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया है। इस शिक्षण का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि परम सत्य केवल ईश्वर (ब्रह्म) है, जबकि यह दृश्य संसार केवल एक आभास या माया है।
स्वामी जी ने कहा कि सबसे पहले, ईश्वर के निकटतम अनुभव की बात की जाती है। जब साधक साधना के माध्यम से ईश्वर के करीब पहुँचता है, तो वह ईश्वर को किसी अलौकिक या भव्य रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत सरल और अपने जैसा अनुभव करता है। प्रारंभ में ईश्वर का ऐश्वर्य (जैसे अनेक भुजाएँ, दिव्य शक्तियाँ आदि) बड़ा और चमत्कारी लगता है, लेकिन जैसे-जैसे भक्ति और आत्मिक निकटता बढ़ती है, यह बाहरी वैभव कम होता जाता है। अंततः ईश्वर अपने भक्त के लिए अत्यंत निकट, स्नेही और ‘स्वजन’ के रूप में प्रकट होते हैं। यह अनुभव दर्शाता है कि ईश्वर कोई दूर की सत्ता नहीं, बल्कि हमारे हृदय के बहुत करीब हैं।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने आगे बताया कि दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु माया का स्वरूप है। श्री रामकृष्ण ने इसे समझाने के लिए जादूगर और घुड़सवार का उदाहरण दिया। जैसे एक जादूगर अपने जादू से लोगों को भ्रमित कर देता है और जो दिखाई देता है वह वास्तविक नहीं होता, वैसे ही यह संसार भी एक प्रकार का भ्रम है। घुड़सवार के आने पर उसके घोड़े और अस्त्र-शस्त्र वास्तविक प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में वे केवल एक आभास होते हैं। इसी प्रकार, हमारा यह जगत भी स्थायी और सत्य नहीं है, बल्कि माया का खेल है। यह समझने पर मनुष्य का मोह धीरे-धीरे कम होने लगता है और वह वास्तविक सत्य की ओर बढ़ता है।
स्वामी जी ने कहा कि तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु संसार की मिथ्यता को समझने की कठिनाई को दर्शाता है। यह जानना कि केवल ईश्वर ही सत्य है और यह संसार असत्य है, आसान नहीं है। मनुष्य अपनी इंद्रियों और अनुभवों के आधार पर इस संसार को ही वास्तविक मानता है। इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना एक कठिन आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसके बावजूद, हमें निरंतर प्रयास करते हुए ईश्वर का आश्रय लेना चाहिए। यही मार्ग हमें सही दिशा में आगे बढ़ाता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि यह शिक्षाएं हमें यह समझाती हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य इस माया रूपी संसार में उलझना नहीं, बल्कि परम सत्य की खोज करना है। जब मनुष्य ईश्वर के प्रति समर्पण और विश्वास के साथ आगे बढ़ता है, तो धीरे-धीरे उसे इस सत्य का अनुभव होने लगता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और बाकी सब अस्थायी है। यही ज्ञान उसे शांति, संतोष और मोक्ष की ओर ले जाता है।




