ओडिशा से ₹3,000 में निकलकर गलियों तक ₹1 लाख का हो जाता है गांजा,
जानिए तस्करों के इस ‘फेवरेट’ काले कारोबार का सच
क्राइम रिपोर्टर संगीता सिंह
ओडिशा से ₹3,000 में निकलकर गलियों तक ₹1 लाख का हो जाता है गांजा, जानिए तस्करों के इस ‘फेवरेट’ काले कारोबार का सच
नशे के सौदागरों के लिए इन दिनों ‘गांजा’ सबसे पसंदीदा और मुनाफेदार सौदा बन चुका है। पुलिस की लगातार कार्रवाई और धरपकड़ के बावजूद गांजा तस्करी के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है कि हर दूसरा तस्कर गांजे की खेप के साथ ही पकड़ा जा रहा है? इसका सीधा और चौंकाने वाला जवाब है— अंधा मुनाफा।
सूत्रों और पुलिसिया पूछताछ में जो गणित सामने आया है, वह होश उड़ाने वाला है। ओडिशा के जंगलों और ग्रामीण इलाकों से जो गांजा महज ₹3,000 प्रति किलो के हिसाब से निकलता है, वह महानगरों और शहरों की तंग गलियों तक पहुंचते-पहुंचते ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) प्रति किलो तक की कीमत पर बिकता है।
कीमत का खेल: ओडिशा से आपकी गली तक का सफर
तस्करी के इस नेटवर्क में मुनाफे का खेल कई स्तरों (Layers) पर बंटा हुआ है:
सोर्स पॉइंट (ओडिशा): उड़ीसा के आंध्र-ओडिशा बॉर्डर (AOB) और अंदरूनी इलाकों में गांजे की खेती बेहद सस्ते दामों पर होती है। यहाँ तस्करों को यह माल ₹3,000 से ₹5,000 प्रति किलो में आसानी से मिल जाता है।
ट्रांसपोर्टेशन (जोखिम का पैसा): जैसे ही यह माल ओडिशा की सीमा पार कर दूसरे राज्यों (जैसे बिहार, यूपी, दिल्ली, एमपी) की ओर बढ़ता है, रिस्क बढ़ने के साथ इसकी कीमत ₹20,000 से ₹30,000 हो जाती है।
लोकल सप्लायर: शहरों के मुख्य सप्लायर इसे ₹40,000 से ₹50,000 में खरीदते हैं।
पुड़िया का खेल (रिटेल मार्केट): जब यह गांजा छोटी-छोटी पुड़िया (Sachets) में बिकने के लिए गलियों और कॉलेजों के आसपास पहुंचता है, तो 5 से 10 ग्राम की एक पुड़िया ₹500 से ₹1,000 में बिकती है। इस हिसाब से उपभोक्ता (Consumer) तक पहुंचते-पहुंचते 1 किलो गांजे की कीमत ₹1,00,000 का आंकड़ा पार कर जाती है।
सख्ती का असर: बैकफुट पर तस्कर, फिर भी ले रहे हैं रिस्क
“पुलिस की मुस्तैदी से बैक-टू-बैक पकड़े जा रहे हैं तस्कर”
पिछले कुछ महीनों में पुलिस और एंटी-नारकोटिक्स सेल ने हाईवे से लेकर रेलवे स्टेशनों तक चेकिंग सख्त कर दी है। इसके परिणामस्वरूप लगातार गांजे के बड़े-बड़े कंसाइनमेंट पकड़े जा रहे हैं। लग्जरी कारों के गुप्त केबिन, ट्रक में सब्जियों के नीचे और यहाँ तक कि एम्बुलेंस का इस्तेमाल करने वाले शातिर तस्कर भी अब सलाखों के पीछे हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतनी सख्ती के बाद भी ये तस्कर रुक क्यों नहीं रहे? पुलिस अधिकारियों का मानना है कि इस धंधे में 3000% से ज्यादा का प्रॉफिट मार्जिन है। इतने भारी मुनाफे के लालच में तस्कर अपनी जान और आजादी दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। एक खेप अगर पकड़ी भी जाए, तो अगली दो खेपें इनका सारा नुकसान पूरा कर देती हैं।
युवा पीढ़ी पर वार, पुलिस का ‘मिशन क्लीन’
इस काले कारोबार का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसका सीधा शिकार स्कूल-कॉलेज के छात्र और युवा पीढ़ी हो रही है। पुलिस अब न सिर्फ बड़े तस्करों को दबोच रही है, बल्कि शहरों के उन लोकल ‘पेडलर्स’ (गलियों में बेचने वाले) पर भी नकेल कस रही है जो युवाओं तक इसे पहुंचाते हैं।

