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12 वर्षीय तेजस नटखट धाड़ीवाल बना आष्टा की आस्था और तपस्या का प्रतीक दूसरी बार कठिन उपाधान तप पूर्ण कर बाल तपस्वी ने बढ़ाया नगर और समाज का गौरव परिवार सहित पूरे शहर को किया गौरवान्वित

एमपी छत्तीसगढ़ डिप्टी स्टेट हेड जितेंद्र राठौर पहलवान की रिपोर्ट

आष्टा। आज के दौर में जहां बच्चे मोबाइल, खेल और आधुनिक जीवनशैली में व्यस्त दिखाई देते हैं, वहीं आष्टा के एक 12 वर्षीय मासूम ने अपनी प्रभु भक्ति, त्याग और तपस्या से पूरे शहर को गौरवान्वित कर दिया। धर्म, संयम और आत्मकल्याण की राह पर चल रहे इस बालक ने यह साबित कर दिया कि दृढ़ संकल्प और प्रभु के प्रति सच्ची आस्था हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती।

साध्वी तत्वरुचिश्रीजी महाराज साहब के पावन प्रेरणा से आष्टा के तेजस (आदि) सुपुत्र राहुल धाड़ीवाल ने दूसरी बार जैन धर्म की कठिन “उपाधान तपस्या” पूर्ण कर धर्म समाज में विशेष पहचान बनाई है। 36 दिवसीय इस कठिन तपस्या की पूर्णाहुति 23 मई 2026 को सापुतारा (गुजरात) में होने जा रही है। इस अवसर पर गुरुजनों द्वारा मोक्ष माला पहनाकर अनुमोदना की जाएगी तथा बालक को स्नेह आशीर्वाद प्रदान किया जाएगा।

परिवार में पहले भी जल चुकी है संयम की ज्योति,,,

तेजस जिस धाड़ीवाल परिवार से संबंध रखते हैं, वह परिवार वर्षों से धर्म और संयम की परंपरा से जुड़ा रहा है। करीब 8 वर्ष पूर्व तेजस की बुआ एवं नगर के वरिष्ठ गल्ला व्यापारी एवं समाजसेवी वीरेंद्र धाड़ीवाल की पुत्री इंजी.भावना धाड़ीवाल ने सांसारिक जीवन का त्याग कर जैन साध्वी दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के पश्चात गुरुजनों द्वारा उनका नाम “साध्वी तत्वरुचिश्रीजी म.सा.” रखा गया,,, तब से वे संयम, त्याग, तपस्या और समाज सेवा के मार्ग पर अग्रसर होकर धर्म प्रभावना में जुटी हुई हैं।

बताया जाता है कि अपनी बुआ के तप, त्याग और प्रभु भक्ति से प्रेरित होकर ही मासूम तेजस के मन में भी धर्म के प्रति विशेष लगाव जागृत हुआ। यही कारण है कि बीते वर्ष नासिक (महाराष्ट्र) में भी तेजस ने 47 दिवसीय कठिन उपाधान तप पूर्ण कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। उस समय सुरीमंत्र स्माराधक आचार्य श्रीमद विजय कुमुदचंद्रसूरीजी म.सा. एवं मुनिराज पुण्यनिधान सुरीजी म.सा. द्वारा तेजस को मोक्ष माला पहनाकर आशीर्वाद प्रदान किया गया था अब तेजस पुनः इनकी ही निश्रा में अपना दूसरा उपधान तप पूर्ण कर रहा है

मंदिर में साधु जीवन, कठिन नियमों का पालन

जानकारों के अनुसार उपाधान तपस्या जैन धर्म की अत्यंत कठिन साधनाओं में से एक मानी जाती है। इसमें तपस्वी को निर्धारित अवधि तक घर-परिवार और सांसारिक सुविधाओं से दूर रहकर मंदिर में साधु जीवन व्यतीत करना पड़ता है। कठोर नियम, संयमित आहार, नियमित पूजा-अर्चना, स्वाध्याय और अनुशासित दिनचर्या का पालन करना होता है। ऐसे कठिन नियमों का पालन जहां बड़े-बड़े लोगों के लिए चुनौती माना जाता है, वहीं 12 वर्षीय तेजस ने अपनी अटूट श्रद्धा और दृढ़ मनोबल से इसे सहज बना दिया।

 

धर्म के प्रति बढ़ती बाल पीढ़ी की आस्था बना प्रेरणा

तेजस की यह तपस्या केवल धाड़ीवाल परिवार ही नहीं बल्कि पूरे जैन समाज और आष्टा नगर के लिए गर्व का विषय बन गई है। सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों द्वारा बालक की भक्ति भावना की सराहना की जा रही है। नगर में चर्चा है कि नई पीढ़ी जहां आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही है, वहीं तेजस जैसे बालक धर्म और संस्कारों की जड़ों को मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं।

तेजस की इस तपस्या ने यह संदेश दिया है कि यदि बचपन से ही संस्कार, संयम और प्रभु भक्ति का वातावरण मिले तो युवा पीढ़ी भी अध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ सकती है। यही कारण है कि आज पूरा शहर इस बाल तपस्वी की उपलब्धि पर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

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