रामकृष्ण मठ, लखनऊ में श्रद्धापूर्वक मनाई गई स्वामी अभेदानन्द जी की जयंती
अमित चावला /लखनऊ

वेदान्त के प्रचार-प्रसार, शास्त्र-अध्ययन एवं आध्यात्मिक जागरण में स्वामी अभेदानन्द जी का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा – स्वामी मुक्तिनाथानन्द
लखनऊ.रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में रविवार को महान संन्यासी एवं वेदान्त के प्रखर प्रचारक स्वामी अभेदानन्द जी महाराज की जयंती श्रद्धा एवं आध्यात्मिक वातावरण में मनाई गई। इस अवसर पर दिनभर विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रातः शंखनाद एवं मंगलारती से हुआ। इसके पश्चात वैदिक मंत्रोच्चारण, ‘नारायण सूक्तम्’ का पाठ तथा ‘जय जय रामकृष्ण भुवन मंगल’ का स्वामी मुक्तिनाथानंद जी के नेतृत्व में सामूहिक गायन किया गया। इन कार्यक्रमों का संचालन रामकृष्ण मठ, लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज के मार्गदर्शन में हुआ। इसके बाद स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज ने ऑनलाइन सत् प्रसंग दिया।
सायंकाल मुख्य मंदिर में संध्यारती के उपरान्त स्वामी सारदानन्द जी द्वारा रचित सपर्षद-श्री रामकृष्ण स्तोत्रम’ का पाठ किया गया। इसके साथ ही स्वामी अभेदानन्द जी महाराज द्वारा रचित ‘श्री रामकृष्णस्तवराजः’ का पाठ एवं प्रार्थना भी सम्पन्न हुई। यह कार्यक्रम रामकृष्ण मठ, लखनऊ के स्वामी इष्टकृपानन्द जी के नेतृत्व में हुआ।
अपने सत्संग में स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज ने स्वामी अभेदानन्द जी के जीवन और उनके आध्यात्मिक संदेश पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि स्वामी अभेदानन्द जी एक महान योगी, विद्वान एवं वेदान्त के प्रभावशाली प्रचारक थे। उनका जीवन गहन साधना, ज्ञान की खोज तथा मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित था।
स्वामी अभेदानन्द जी का जन्म 2 अक्टूबर 1866 को कलकत्ता के आहिरिटोला क्षेत्र में हुआ था। बचपन से ही वे अत्यन्त मेधावी थे और संस्कृत तथा भारतीय शास्त्रों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि थी। श्री रामकृष्ण देव के सान्निध्य ने उनके जीवन को नई दिशा प्रदान की। श्री रामकृष्ण एवं श्री माँ सारदा देवी के प्रति उनकी गहन श्रद्धा उनके द्वारा रचित अनेक स्तोत्रों एवं प्रार्थनाओं में अभिव्यक्त होती है।
स्वामी विवेकानन्द जी के आह्वान पर स्वामी अभेदानन्द जी 1896 में वेदान्त के प्रचार के लिए लंदन गए और बाद में अमेरिका में वेदान्त आन्दोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग 25 वर्षों तक उन्होंने अमेरिका के विभिन्न भागों में वेदान्त का प्रचार-प्रसार किया और वहाँ अनेक लोगों को भारतीय आध्यात्मिक दर्शन से परिचित कराया। वे 1921 में भारत लौटे। भारत वापसी के दौरान उन्होंने जापान, चीन, फिलीपींस, सिंगापुर, कुआलालंपुर तथा रंगून आदि स्थानों का भी भ्रमण किया और वेदान्त का संदेश पहुँचाया।
भारत लौटने के बाद उन्होंने व्यापक यात्राएँ कीं। उन्होंने हिमालय एवं तिब्बत की यात्रा कर वहाँ के दर्शन, संस्कृति एवं बौद्ध परम्पराओं का अध्ययन किया। अपनी यात्राओं और अनुभवों का विस्तृत विवरण उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘कश्मीर और तिब्बत यात्रा’ में प्रस्तुत किया।
स्वामी अभेदानन्द जी ने भारत में भी वेदान्त के प्रचार-प्रसार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। 1923 में कोलकाता में रामकृष्ण वेदान्त सोसाइटी की स्थापना की, जो आगे चलकर रामकृष्ण वेदान्त मठ के रूप में विकसित हुई। 1924 में उन्होंने दार्जिलिंग में रामकृष्ण वेदान्त मठ की स्थापना की। उन्होंने ‘विश्ववाणी’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन भी किया और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा तथा वेदान्त के प्रचार में लेखन के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया।
स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज ने कहा कि रामकृष्ण मठ में शास्त्र-अध्ययन एवं स्वाध्याय की परम्परा को सुदृढ़ करने तथा रामकृष्ण मठ के संन्यासीवृन्द को दशनामी संन्यास परम्परा से सम्बद्ध करने में स्वामी अभेदानन्द जी का योगदान विशेष रूप से स्मरणीय है। उनके द्वारा रचित श्री रामकृष्ण एवं श्री माँ सारदा देवी के ध्यान-मंत्र और स्तोत्र आज भी साधकों के आध्यात्मिक जीवन में प्रेरणा एवं साधना के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
स्वामी अभेदानन्द जी महाराज ने अपने जीवन के माध्यम से ज्ञान, भक्ति, साधना और वेदान्त के सार्वभौमिक संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उनका जीवन आज भी आध्यात्मिक साधकों तथा सत्य के जिज्ञासुओं के लिए प्रेरणादायी है।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं एवं भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।



