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अहंकार के बिना गए ज्ञान लाभ नहीं होता – स्वामी मुक्तिनाथानंद

अमित कुमार चावला /लखनऊ.

 

 

विनम्र मन में ही ईश्वर की कृपा आती है – स्वामी जी

 

 

रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि ईश्वर प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं, फिर भी मनुष्य उन्हें अनुभव नहीं कर पाता। इसका सबसे बड़ा कारण अहंकार है। अहंकार को यहाँ एक काल्पनिक दीवार के रूप में समझाया गया है। जैसे दीवार दो वस्तुओं के बीच दूरी पैदा करती है, वैसे ही अहंकार मनुष्य और उसके भीतर स्थित ईश्वर के बीच दूरी का अनुभव कराता है। वास्तव में ईश्वर हमसे अलग नहीं हैं, लेकिन हमारा ‘मैं’ हमें इस सत्य को देखने और अनुभव करने से रोकता है।

स्वामी जी ने बताया कि यह अहंकार मुख्य रूप से तीन प्रकार से प्रकट होता है—ज्ञान का अभिमान, धन का अभिमान और उच्च पद या प्रतिष्ठा का अभिमान। मनुष्य जब अपने ज्ञान पर गर्व करता है तो उसे लगता है कि वह दूसरों से अधिक जानता है। धन का अभिमान व्यक्ति को अपनी संपत्ति के कारण श्रेष्ठ समझने की भावना देता है। इसी प्रकार पद, प्रतिष्ठा या सामाजिक स्थिति का अभिमान व्यक्ति के भीतर श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न करता है। आध्यात्मिक जीवन में ये सभी भाव बाधा बन सकते हैं, क्योंकि ईश्वर की अनुभूति के लिए विनम्रता, सरलता और आत्मसमर्पण आवश्यक हैं। जब मनुष्य अपने ज्ञान, धन और प्रतिष्ठा को अंतिम सत्य मानना छोड़ देता है, तब उसके भीतर वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए स्थान बनता है।

स्वामी जी ने कहा अतः ईश्वर को पाने के लिए संसार छोड़ना ही आवश्यक नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को छोड़ना अधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य संसार में रहते हुए भी येविनम्रता, सेवा, प्रेम और आत्मचिंतन के द्वारा अपने भीतर स्थित दिव्यता को अनुभव कर सकता है। इस प्रकार अहंकार की दीवार हटते ही मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप और ईश्वर की निकटता का बोध होने लगता है।

स्वामी जी ने कहा कि संसार में रहना या “कामिनी-कांचन” यानी भोग-विलास और धन-संपत्ति का होना अपने आप में गलत नहीं है।समस्या तब आती है जब हम इन चीजों से _आसक्त_ हो जाते हैं।
आसक्ति से अहंकार पैदा होता है। जब हम सोचते हैं “ये सब मेरा है”, “मैं बहुत बड़ा हूँ”, तो हमारा ‘मैं’ यानी ego बढ़ जाता है। और यही अहंकार आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट है। आध्यात्मिकता का मतलब है ईश्वर के करीब जाना, लेकिन अहंकार की दीवार हमें उससे दूर कर देती है। इसलिए संसार में रहते हुए भी मोह और आसक्ति को छोड़ना जरूरी है।

 

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए विनम्रता जरूरी है और अहंकार सबसे बड़ी बाधा है। सिर्फ ज्ञान प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं है। असली बात है उस ज्ञान को अपने अंदर बनाए रखना और ईश्वर की कृपा पाना।
इसके लिए दो चीजें बहुत जरूरी बताई गई हैं; प्रथम विनम्र भाव रखना विनम्र व्यक्ति सीखने के लिए हमेशा तैयार रहता है। वह अपने को सबसे छोटा समझता है, इसलिए उसमें ज्ञान ठहरता है। जैसे खाली बर्तन में ही पानी भरा जा सकता है, वैसे ही विनम्र मन में ही ईश्वर की कृपा आती है। दूसरा अहंकार को छोड़ना –
अहंकार यानी “मैं” और “मेरा” का भाव हमें ईश्वर से दूर कर देता है। जब हम सोचते हैं “मैं सबसे ज्ञानी हूँ”, “मैंने सब कर लिया”, तो हम और ईश्वर के बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है। यही अहंकार हमें घमंडी बनाता है और हमारी आध्यात्मिक प्रगति रोक देता है।

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