मामला शासकीय जमीन का सबूत,शिकायतें और सन्नाटा:-
*ग्राम चाकरोद में लग-भग 200 बीघा शासकीय भूमि का मामला*

कालापीपल(बब्लू जायसवाल)जनहित से जुड़े एक गंभीर मामले में वर्षों से शिकायतें,जांच रिपोर्ट और दस्तावेज सामने आने के बावजूद शासकीय भूमि को लेकर कार्रवाई का इंतजार बना हुआ है,मामला ग्राम पंचायत चकरोद की करीब 200 बीघा शासकीय भूमि से जुड़ा बताया जा रहा है,जिसकी वर्तमान बाजार कीमत करोड़ों रुपये होने का दावा किया जा रहा है।
इस मामले में स्थानीय पत्रकारों द्वारा जनहित में लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है,बताया जाता है कि वे इस मामले में अपने निजी खर्च से पैरवी कर रहे हैं और उनका कहना है कि उनका उद्देश्य संबंधित भूमि को शासन के हित में सुरक्षित कराना है।जानकारी के अनुसार वर्ष 1981-82 में ग्राम पंचायत चाकरोद में अनुसूचित जाति वर्ग के जरूरतमंद परिवारों को जीवन-यापन के लिए 64 शासकीय पट्टे आवंटित किए गए थे,इन पट्टों की भूमि के विक्रय पर प्रतिबंध था,शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि बाद में इन पट्टों की भूमि की खरीद-फरोख्त की गई तथा विक्रय प्रतिबंध हटाने के लिए कथित तौर पर फर्जी आदेशों का इस्तेमाल कर रजिस्ट्रियां कराई गईं,मामले की शिकायत के बाद हुई राजस्व जांच में तीन पटवारियों और दो राजस्व निरीक्षकों की रिपोर्ट में 22 लोगों के नाम सामने आने की बात कही जा रही है,प्रकरण इसके बाद अनुविभागीय अधिकार (राजस्व)न्यायालय तक पहुंचा और वर्तमान में विचाराधीन है,इस मुद्दे को लेकर पिछले करीब 15 वर्षों में कई बार समाचार प्रकाशित होने,शिकायतें किए जाने और दस्तावेज अधिकारियों को सौंपे जा चुके हैं, इसके बावजूद अब तक मामले का अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है,इस अवधि में क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां भी बदलीं और कई जनप्रतिनिधि पदों पर आए,लेकिन भूमि संबंधी विवाद का समाधान अभी भी लंबित है,बताया जाता है कि विवादित भूमि का एक बड़ा हिस्सा मुख्य सड़क से लगा हुआ है,शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि भूमि के कुछ हिस्सों का खुलेआम व्यवसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं तथा कुछ स्थानों पर प्लॉट काटकर बिक्री भी हो चुकी है,हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित न्यायालय एवं सक्षम प्रशासनिक जांच के निष्कर्ष से ही होगी।
सबसे बड़ा सवाल-कार्रवाई कब ?
मामले में शिकायतें,राजस्व जांच और दस्तावेज सामने आने के बावजूद यदि भूमि वास्तव में शासकीय पाई जाती है,तो उसे सुरक्षित कर शासन के उपयोग में लाने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की बनती है,ऐसी भूमि का उपयोग विद्यालय,अस्पताल,खेल मैदान,शासकीय कार्यालय अथवा अन्य जनहितकारी योजनाओं के लिए किया जा सकता है।
*अब क्षेत्रवासियों की निगाहें राजस्व न्यायालय के निर्णय और प्रशासन की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं,सवाल यही है कि वर्षों से चले आ रहे इस विवाद का अंतिम समाधान कब होगा और यदि जांच में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे या नियम विरुद्ध हस्तांतरण की पुष्टि होती है,तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी ?



