*एक तरफ लोकार्पण का उत्सव,
दूसरी तरफ मानदेय को तरसते 'गौ सेवकों' का छलका दर्द*
*संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव*
*एक तरफ लोकार्पण का उत्सव, दूसरी तरफ मानदेय को तरसते ‘गौ सेवकों’ का छलका दर्द* 
राजनांदगांव। एक ओर जहाँ श्री गौशाला पिंजरा पोल परिसर में मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह द्वारा जनहित एवं विकास कार्यों का भव्य लोकार्पण किया गया, वहीं दूसरी ओर इसी आयोजन के साए में छत्तीसगढ़ पशुधन मित्र संघ (प्रशिक्षित गौ सेवक/PAIW/मैत्री) के कार्यकर्ताओं का बरसों पुराना दर्द छलक पड़ा।
जहाँ मंच से गौ-सेवा और संवर्धन के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे, वहीं धरातल पर रात-दिन मवेशियों की सेवा करने वाले इन पशुधन मित्रों का मानदेय को लेकर दर्द बयाँ हुआ। वर्षों से ईमानदारी से अपनी सेवाएँ दे रहे इन कार्यकर्ताओं के चेहरे पर उपेक्षा की निराशा साफ नजर आ रही थी।
“सेवा का जज़्बा, लेकिन पेट का सवाल अधूरा”
कार्यक्रम के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं ने अपना दर्द बयाँ करते हुए कहा कि वे वर्षों से पशुओं के उपचार, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान और गौ-सेवा के कार्यों में निष्ठापूर्वक लगे हुए हैं। इसके बावजूद, अपने जायज़ मानदेय और अधिकारों के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ रहा है।
अपनी व्यथा सुनाते हुए कुछ कार्यकर्ताओं का गला भर आया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि निष्ठा और लगन से सेवा करने के बाद भी जब पारिश्रमिक के नाम पर निराशा मिलती है, तो उस पीड़ा को बयाँ करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं।
उठ रहे गंभीर सवाल
एक ओर राज्य में गौ-वंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए बड़े-बड़े आयोजनों के ज़रिए लोकार्पण और भूमिपूजन किए जा रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर पशु स्वास्थ्य की रीढ़ माने जाने वाले इन प्रशिक्षित ‘मैत्री’ कार्यकर्ताओं की अनदेखी शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
संघ के सदस्यों का कहना है कि सरकार को न केवल अवसंरचना (Infrastructure) के विकास पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि उन हाथों को भी मज़बूत करना चाहिए जो ज़मीनी स्तर पर बिना किसी स्वार्थ के पशुधन की रक्षा में लगे हैं।
अब देखना यह होगा कि इस भव्य लोकार्पण समारोह के बीच उठी इन निस्वार्थ गौ सेवकों की मूक चीख और मानदेय की मांग पर शासन-प्रशासन का ध्यान कब तक आकर्षित होता है।

