छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है।
रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान का दावा: सरकार से मांगा ₹3500 करोड़ का मुआवजा, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है।
रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान का दावा: सरकार से मांगा ₹3500 करोड़ का मुआवजा, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी में जहां एक तरफ प्रशासन द्वारा अतिक्रमण और अवैध कब्जे के खिलाफ कार्रवाई करते हुए नकटी गांव को ढहा दिया गया, वहीं दूसरी तरफ एक स्थानीय किसान ने ऐसा दावा ठोक दिया है जिसने शासन-प्रशासन के होश उड़ा दिए हैं। किसान का दावा है कि रायपुर का ‘स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट’ जिस जमीन पर खड़ा है, वह उसकी पुश्तैनी संपत्ति है।
इस जमीन के बदले किसान ने सरकार से 3500 करोड़ रुपये के भारी-भरकम मुआवजे की मांग की है। हक की इस लड़ाई को लेकर पीड़ित किसान अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटा चुका है।
“टर्मिनल के सामने का गार्डन मेरी पुश्तैनी जमीन”
यह पूरा मामला रायपुर के रहने वाले अश्वनी बांधे नाम के युवक से जुड़ा है। अश्वनी का दावा है कि रायपुर एयरपोर्ट के मुख्य टर्मिनल के ठीक सामने जो खूबसूरत गार्डन (बगीचा) बना हुआ है, वह पूरी जमीन उनके पूर्वजों की है।
अश्वनी बांधे ने मीडिया से बात करते हुए कहा:
“जिस जमीन पर आज आलीशान एयरपोर्ट और उसका गार्डन बना हुआ है, वह मेरी पुश्तैनी जमीन है। इस जमीन की सरकारी और बाजारू कीमत आज करीब 35 करोड़ रुपये है। लेकिन आज तक सरकार या प्रशासन की तरफ से हमें इस जमीन का एक रुपया भी मुआवजा नहीं मिला है। हम सालों से अपने हक के लिए भटक रहे हैं।”
₹35 करोड़ की जमीन, ₹3500 करोड़ का दावा क्यों?
आमतौर पर जमीन की कीमत के आधार पर ही मुआवजा तय होता है, लेकिन अश्वनी ने ₹3500 करोड़ की मांग क्यों की? इस पर उनके कानूनी सलाहकारों और पक्ष का कहना है कि यह केवल जमीन की मूल कीमत नहीं है। इसमें पिछले कई दशकों से जमीन का बिना अनुमति इस्तेमाल करने का हर्जाना, उस पर बने एयरपोर्ट से हुई व्यावसायिक कमाई का हिस्सा और इतने सालों तक परिवार को मिले मानसिक व आर्थिक कष्ट का ब्याज और मुआवजा शामिल है।
नकटी गांव की कार्रवाई के बाद गर्माया मुद्दा
यह मामला ऐसे समय में और ज्यादा तूल पकड़ रहा है जब हाल ही में प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाते हुए अतिक्रमण के नाम पर पास के ही नकटी गांव को पूरी तरह जमींदोज कर दिया। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर अब यह सवाल तैर रहा है कि: ‘अगर गरीब ग्रामीणों और किसानों की जमीनों पर अतिक्रमण बताकर बुलडोजर चलाया जा सकता है, तो सालों से एक किसान की पुश्तैनी जमीन पर बिना मुआवजा दिए बने एयरपोर्ट पर प्रशासन क्या रुख अपनाएगा?’
सुप्रीम कोर्ट पर टिकी नजरें
स्थानीय राजस्व कार्यालयों और हाईकोर्ट के चक्कर काटने के बाद, जब अश्वनी को न्याय नहीं मिला तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट में दाखिल याचिका में जमीन के मालिकाना हक के दस्तावेज (खसरा-खतौनी) पेश किए गए हैं।
अब देखना यह होगा कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत क्या फैसला सुनाती है। यदि किसान के दस्तावेज सही पाए जाते हैं, तो यह नागरिक उड्डयन मंत्रालय (Civil Aviation Ministry) और छत्तीसगढ़ सरकार के लिए अब तक का सबसे बड़ा कानूनी और वित्तीय संकट बन सकता है।

