E-Paperhttps://bharatsamvadtv.com/wp-content/uploads/2024/01/jjujuu.gifक्राइमछत्तीसगढ़टॉप न्यूज़राजनीतिराज्यलोकल न्यूज़

जमीनी हकीकत: कागजों में ‘आदर्श’, धरातल पर ‘बदहाल’ गांव

अगर निष्पक्ष जांच हुई तो खाली हो जाएंगी पंचायतें

*जमीनी हकीकत: कागजों में ‘आदर्श’, धरातल पर ‘बदहाल’ गांव; अगर निष्पक्ष जांच हुई तो खाली हो जाएंगी पंचायतें!*

*संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव*

ग्रामीण क्षेत्र: सरकार द्वारा गांव-गांव तक विकास पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट पानी की तरह बहाया जा रहा है। आवास, शौचालय, मनरेगा, नल-जल और सड़क निर्माण जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का मकसद ग्रामीण जीवन स्तर को सुधारना है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। अगर ग्राम पंचायतों में चल रहे निर्माण और विकास कार्यों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच करा दी जाए, तो भ्रष्टाचार का एक ऐसा तंत्र उजागर होगा, जिसमें 90% जिम्मेदार प्रतिनिधियों व अधिकारियों पर गाज गिरना तय है।
कागजों में दौड़ रहा ‘नल-जल’ और चमक रही ‘लाइटें’
गांवों में योजनाओं की स्थिति इतनी बदतर है कि कागजों पर जिन गांवों को खुले में शौच मुक्त (ODF) और हर घर नल-जल योजना से संतृप्त घोषित कर दिया गया है, वहाँ आज भी ग्रामीण पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।
नल-जल योजना और गर्मी में पानी: करोड़ों की लागत से बिछाई गई पाइपलाइनें सूखी पड़ी हैं। गर्मी के मौसम में टैंकर सप्लाई के नाम पर फर्जी बिल भुनाए जाते हैं, जबकि ग्रामीण दूर-दराज के हैंडपंपों या गंदे स्रोतों से पानी ढोने को मजबूर हैं।
आवास योजना और शौचालय: ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ में कटमनी और कमीशनखोरी का खेल किसी से छिपा नहीं है। गरीबों के हक का मकान कागजी फाइलों में तो बन जाता है, लेकिन धरातल पर उनकी किस्तें अटकी रहती हैं। यही हाल शौचालयों का है—अधिकांश निर्माण या तो आधे-अधूरे हैं या फिर मवेशियों को बांधने और कबाड़ रखने के काम आ रहे हैं।
मनरेगा में बड़ा खेल: मनरेगा (MGNREGA) में मजदूरों के बजाय मशीनों से काम कराना और फर्जी ‘मस्टर रोल’ तैयार कर बैंक खातों से राशि गबन करना एक आम ढर्रा बन चुका है। जो मजदूर वास्तव में पसीना बहाते हैं, उनके नाम पर फर्जीवाड़ा कर बिचौलिए मलाई खा रहे हैं।
गुणवत्ता विहीन सड़क, नाली और ठप पड़ी स्ट्रीट लाइटें
ग्राम पंचायत स्तर पर बनने वाली सड़कें और नालियाँ पहली ही बारिश में बह जाती हैं। डामरीकरण और कंक्रीट निर्माण में तय मानकों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।
गांवों को रोशन करने के नाम पर घटिया गुणवत्ता की स्ट्रीट लाइटें लगाई जाती हैं, जो हफ्ता भर भी नहीं चलतीं। नालियों की नियमित सफाई के नाम पर केवल सफाई कर्मचारियों के नाम दर्ज कर फर्जी भुगतान उठा लिया जाता है, जबकि गांव की गलियाँ आज भी कीचड़ और बदबू से सराबोर हैं।
त्रिस्तरीय मिलीभगत का आरोप
स्थानीय ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यह पूरा खेल अकेले संभव नहीं है। इसमें सरपंच, पटवारी और पंचायत सचिव की त्रिस्तरीय जुगलबंदी (सिंडिकेट) काम करती है।
निर्माण कार्य का भौतिक सत्यापन किए बिना फाइलों को पास करना,
जमीन के फर्जी सीमांकन और मस्टर रोल पर पटवारी व सचिव की साठगांठ,
और अंततः सरपंच की शह पर राशि का आहरण—यह पूरा चक्र योजनाओं को गटक रहा है।
“यदि प्रशासन केवल पिछले 5 वर्षों के कार्यों की तकनीकी और भौतिक निष्पक्ष जांच (Physical Inspection & Audit) करा दे, तो पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की कलई खुल जाएगी। फर्जी मस्टर रोल, गुणवत्ताहीन निर्माण और कागजी भुगतानों के एवज में बड़ी संख्या में जिम्मेदारों का जेल जाना तय है।” — स्थानीय जागरूक नागरिक
सुधार की दरकार: क्या जागेगा प्रशासन?
सरकारी योजनाओं का मकसद अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुँचाना था, लेकिन भ्रष्टाचार के इस तंत्र ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। ग्रामीणों की मांग है कि ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों की जांच जिला स्तरीय स्पेशल टास्क फोर्स या निष्पक्ष ऑडिट टीम से कराई जाए, ताकि गरीबों के हक का पैसा निगलने वाले सलाखों के पीछे पहुँच सकें।

शेखर ठाकुर संपादक

शेखर ठाकुर वर्तमान में भारत संवाद न्यूज़ चैनल और दैनिक संवाद अपडेट समाचार पत्र में छत्तीसगढ़ संपादक के रूप कार्यभार संभाल रहे हैं। पत्रकारिता के प्रति अपने समर्पण और स्थानीय मुद्दों पर गहरी पकड़ के लिए पहचाने जाने वाले शेखर, छत्तीसगढ़ की हर छोटी-बड़ी खबर को प्रमाणिकता के साथ जनता और प्रशासन तक पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!