*भिलाई तीन (शांतिनगर-इंदिरा पारा) में प्रशासनिक लाचारी*
*2004 से हो रही शिकायतों के बाद भी सार्वजनिक कुएं पर अवैध कब्जा*मकान बनने के अंतिम पड़ाव पर स्टे और जारी निर्माण पर उठे बड़े सवाल*

*भिलाई तीन (शांतिनगर-इंदिरा पारा) में प्रशासनिक लाचारी*
*2004 से हो रही शिकायतों के बाद भी सार्वजनिक कुएं पर अवैध कब्जा*मकान बनने के अंतिम पड़ाव पर स्टे और जारी निर्माण पर उठे बड़े सवाल*
*संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव*
भिलाई तीन (शांतिनगर/इंदिरा पारा):
छत्तीसगढ़ के भिलाई तीन नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत प्रशासनिक लचरता, अनदेखी और नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। यहां के शांतिनगर और इंदिरा पारा जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में जनता के हक के सार्वजनिक कुएं को पाटकर उस पर एक अधिवक्ता (वकील) द्वारा खुलेआम अवैध कब्जा करने और पक्का घर तानने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर अनियमितता पर स्थानीय प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं है और जिम्मेदार अधिकारी पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।
प्रशासन की कार्यप्रणाली और मंशा पर गंभीर सवाल
2004 से लगातार शिकायत, फिर भी ढिलाई क्यों?
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस अवैध कब्जे और सार्वजनिक कुएं को पाटने की शिकायत साल 2004 से यानी पिछले 20-22 सालों से लगातार की जा रही है। जब शिकायत 2004 से हो रही थी, तो प्रशासन इतने सालों तक गहरी नींद में क्यों सोया रहा? मकान के पूरी तरह बनकर अंतिम पड़ाव पर पहुँचने का इंतजार क्यों किया गया? शुरुआती दौर में ही सख्त कार्रवाई कर स्टे क्यों नहीं दिया गया? क्या प्रशासन मकान के बनने का इंतजार कर रहा था?
स्टे के बावजूद धड़ल्ले से जारी है निर्माण:
जब जनता का आक्रोश बढ़ा, तो मजबूरी में जाकर अब मकान के अंतिम चरण में तहसीलदार द्वारा स्टे (स्थगन आदेश) जारी किया गया। लेकिन असली सवाल यह है कि जब तहसीलदार साहब ने खुद स्टे दिया है, तो फिर उस अवैध निर्माण पर अब भी रोक क्यों नहीं लग रही है और दिन-दहाड़े काम कैसे जारी है?
अधिकारियों की चुप्पी और अजीबोगरीब तर्क:
जब इस विषय पर मीडिया और स्थानीय नागरिकों ने अधिकारियों से सवाल दागे, तो जिम्मेदार मौन धारण कर गए। हद तो तब हो गई जब महोदय ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “मामला कोर्ट में लंबित है।” जनता अब सीधे पूछ रही है कि जब मामला कोर्ट में लंबित था, तो आपने स्टे किस आधार पर दिया? और यदि स्टे दिया गया, तो कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाकर चल रहे काम को तुरंत क्यों नहीं रुकवाया गया?
जनता का आक्रोश और अधिकारों का हनन
सार्वजनिक कुएं जैसी सामुदायिक संपत्ति पर कब्जा होना न केवल आम जनता के जल अधिकारों पर डाका है, बल्कि यह कानून के रखवालों द्वारा ही कानून का मखौल उड़ाने का जीता-जागता उदाहरण है। जब एक आम गरीब नागरिक रत्ती भर भी नियमों का उल्लंघन करता है, तो प्रशासन तुरंत बुलडोजर और सख्त कार्रवाई की धमकी देता है, लेकिन इस मामले में 2004 से चल रही शिकायतों के बावजूद एक रसूखदार वकील के आगे पूरा स्थानीय प्रशासन और राजस्व विभाग पंगु नजर आ रहा है।
यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत और लीपापोती को साफ उजागर कर रही है।
“क्या भिलाई तीन में कानून सिर्फ आम जनता के लिए है और रसूखदारों के लिए नियम जेब की चीज बन चुके हैं? 2004 से आज तक शिकायतों को दबाने वाले और स्टे के बावजूद काम न रुकवाने वाले अधिकारियों के खिलाफ जनता अब उच्च स्तर पर शिकायत दर्ज कराएगी ताकि इस पूरे खेल की निष्पक्ष जांच हो सके।”
इस खबर से जुड़ी आगे की अपडेट और दस्तावेजों के खुलासे के लिए बने रहिए हमारे साथ।

