जीवन का अंतिम लक्ष्य है ईश्वर के प्रति समर्पण – स्वामी मुक्तिनाथानंद
अमित कुमार चावला /लखनऊ.

लखनऊ.शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने 25 अक्टूबर, 1885 की एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन है, जिसमें तीन महान व्यक्तित्व शामिल हैं – श्रीरामकृष्ण, उनके शिष्य मास्टर महाशय और डॉ.महेन्द्रलाल सरकार इस प्रसंग का मुख्य केंद्र है – विज्ञान और भक्ति का टकराव।
स्वामी जी ने बताया कि डॉ. सरकार एक बहुत बड़े वैज्ञानिक और तर्कवादी डॉक्टर थे। वे किसी भी चीज को विज्ञान की कसौटी पर परखते थे। इसलिए उन्हें यह मानना बहुत कठिन लग रहा था कि श्रीरामकृष्ण कोई दिव्य अवतार हैं। उनका तर्क था – अगर आप भगवान हैं, तो आप अपने ही गले के कैंसर को ठीक क्यों नहीं कर लेते? एक अवतार बीमार कैसे पड़ सकता है? वे श्रीरामकृष्ण की बीमारी को केवल मेडिकल नजरिये से देख रहे थे। उनके लिए कैंसर एक शारीरिक रोग था, जिसका इलाज दवा से होगा, चमत्कार से नहीं।
स्वामी जी ने कहा कि यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर को केवल बुद्धि और विज्ञान से नहीं समझा जा सकता। ईश्वर को समझने के लिए भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि भी चाहिए, जो डॉ. सरकार में धीरे-धीरे विकसित हो रही थी।
स्वामी जी ने कहा कि डॉ. महेन्द्रलाल सरकार के जीवन के सबसे बड़े परिवर्तन का वर्णन है।मास्टर महाशय बताते हैं कि डॉ. सरकार एक बात से बहुत विचलित हो गए थे। किसी ने कहा था कि श्रीरामकृष्ण ने यह बीमारी डॉक्टरों के अहंकार को तोड़ने के लिए लीला के रूप में धारण की है। एक विज्ञानवादी डॉक्टर के लिए यह बात सुनना बहुत कठिन था। लेकिन यहीं से चमत्कार शुरू हुआ।
आश्चर्य की बात है कि वही तर्क करने वाले डॉ. सरकार ने बाद में मास्टर महाशय को स्वयं स्वीकार किया कि वे रात को 3 बजे से सुबह तक सिर्फ श्रीरामकृष्ण के चिंतन में बैठे रहे। यह कोई साधारण बात नहीं थी। जो व्यक्ति पहले ईश्वर के अवतार को मानने से इनकार करता था, वही अब रात-रात भर उसी का ध्यान कर रहा है। यह उनके विश्वास और मानसिकता में एक बहुत बड़ा बदलाव था। उनका विज्ञान भक्ति में बदल रहा था, उनका तर्क प्रेम में पिघल रहा था।
स्वामी जी ने बताया कि श्रीरामकृष्ण एक बहुत गहरा सत्य समझाते हैं।वे कहते हैं कि ये पढ़े-लिखे लोग शुरू में तर्क पर ही भरोसा करते हैं, यह स्वाभाविक है। लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य तर्क नहीं, ईश्वर के प्रति समर्पण है। तर्क से हम संसार को समझ सकते हैं, पर ईश्वर को नहीं पा सकते।
जब हम भगवान के अवतार का चिंतन करते हैं, उनके प्रेम में डूबते हैं, तब हम संसार के भ्रम यानी माया से ऊपर उठ जाते हैं। डॉ. सरकार का रात भर चिंतन करना ही इस बात का प्रमाण था कि वे अब तर्क की सीमा से आगे बढ़कर समर्पण के मार्ग पर चल पड़े थे, जो मुक्ति की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्रीरामकृष्ण सिखाते हैं कि जब भक्त सच्चे दिल से, व्याकुल होकर ईश्वर को पुकारता है – चाहे वह संदेह में हो, दर्द में हो या तकलीफ में हो – तो ईश्वर जरूर सुनता है। ईश्वर कभी अपने भक्त की पुकार को अनसुना नहीं करता। वह जवाब देता है और भक्त को अपने और करीब खींच लेता है। डॉ. सरकार का रात भर जागकर चिंतन करना भी एक प्रकार की व्याकुल पुकार ही थी। और उसी पुकार का उत्तर था कि उनका कठोर वैज्ञानिक मन धीरे-धीरे पिघलकर भक्त बन गया।यही दिव्य कृपा हमें एक सफल और सार्थक जीवन की ओर ले जाती है।




