देवास कांग्रेस की कार्यकारिणी बनी, पर कांटाफोड़ ‘गायब’: क्या जमीनी सच्चाई से मुंह मोड़ रहा संगठन?”
देवास/कांटाफोड़। जिला ग्रामीण कांग्रेस की नई कार्यकारिणी के गठन के साथ ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी की स्वीकृति और जिला अध्यक्ष की अनुशंसा के बाद घोषित इस सूची ने संगठन के भीतर गहरे असंतोष को जन्म दे दिया है। सबसे बड़ा सवाल अब सीधे तौर पर कांटाफोड़ को लेकर उठ रहा है—क्या संगठन ने अपनी ही सबसे मजबूत जमीन को नजरअंदाज कर दिया?
कांटाफोड़, जिसे लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, इस बार पूरी तरह कार्यकारिणी से बाहर नजर आया। यह वही ब्लॉक है जो हर परिस्थिति में जीत दर्ज करने के लिए जाना जाता है और जिसने मध्यप्रदेश की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई है। इतना ही नहीं, प्रदेश की एकमात्र नगर परिषद को निर्विरोध बनाने में भी कांटाफोड़ की अहम भूमिका रही, जिसमें मनोज श्याम होलानी समर्थकों का योगदान निर्णायक माना जाता है। इसके बावजूद, इन समर्थकों को भी नई सूची में स्थान नहीं दिया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थिति तब और चौंकाने वाली हो जाती है जब सामने आता है कि जिले के अधिकांश ब्लॉक अध्यक्षों को जिला कार्यकारिणी में स्थान दिया गया, लेकिन पूजापुरा, कांटाफोड़ और बागली ब्लॉक अध्यक्षों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यह चयन प्रक्रिया अब खुद संगठन के भीतर ही सवालों के घेरे में आ गई है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं में इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। उनका कहना है कि जिन्होंने हर चुनाव में संगठन को मजबूती दी, संघर्ष के समय सबसे आगे खड़े रहे, आज वही लोग सूची से गायब कर दिए गए। इससे यह संदेश जा रहा है कि जमीनी मेहनत और वास्तविक ताकत को दरकिनार किया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर स्वर्गीय श्याम होलानी के दौर की याद दिला दी है। वह समय संगठनात्मक मजबूती और संतुलन का प्रतीक माना जाता था, जब जिले में कोई भी बड़ा निर्णय उनके मार्गदर्शन के बिना पूरा नहीं होता था। उन्होंने कांटाफोड़ को कांग्रेस का गढ़ बनाया और हर कार्यकर्ता को संगठन की रीढ़ के रूप में खड़ा किया।
श्याम होलानी की राजनीति में कार्यकर्ता सर्वोपरि था। वे हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता को सम्मान देते थे और यही कारण था कि उनके समय में संगठन केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत दिखाई देता था। आज जब उनके ही क्षेत्र और उनके समर्थकों को कार्यकारिणी से पूरी तरह बाहर रखा गया है, तो यह केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि उस विरासत से दूरी का संकेत माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है—
“क्या कांटाफोड़ की जीत, उसकी मेहनत और उसका इतिहास अब कोई मायने नहीं रखता?”
यह मुद्दा अब सिर्फ नाराजगी तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे एक बड़े विरोध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कार्यकर्ताओं के बीच साफ तौर पर यह भावना उभर रही है कि उनकी उपेक्षा की गई है और उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो यह केवल एक सूची नहीं, बल्कि एक ऐसा फैसला बन गया है, जिसने संगठन की जमीनी हकीकत और उसकी दिशा—दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह असंतोष किस रूप में सामने आएगा, इस पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
फिलहाल, कांटाफोड़ से एक ही आवाज उठ रही है—
“जिस जमीन ने संगठन को खड़ा किया, क्या आज उसी को भुला दिया गया?”
इस खबर में ओर कुछ कर सकते हे क्या


