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त्यागी व ज्ञानी संन्यासी बेदाग है- स्वामी मुक्तिनाथानंद

 

त्यागी व ज्ञानी संन्यासी बेदाग है- स्वामी मुक्तिनाथानंद

रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि  श्री रामकृष्ण परमहंस ने गृहस्थ जीवन को त्याज्य नहीं माना, बल्कि उसमें रहते हुए ईश्वर को पाने का मार्ग दिखाया। ठाकुर चार गूढ़ दृष्टांतों से बताते हैं कि संसार में रहकर भी मन को शुद्ध और ईश्वरमुखी कैसे रखा जाए। इनका सार है—पलायन नहीं, रूपांतरण।

1. संसार में सावधानी: ‘काजल की कोठरी’
ठाकुर संसार को ‘काजल की कोठरी’ कहते हैं। जैसे कोयले से भरे कमरे में सफेद कपड़ा लेकर जाने पर लाख बचाने पर भी दाग लग ही जाता है, वैसे ही यह जगत कामिनी-कांचन रूपी काजल से भरा है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए ईश्वर में मन लगाना इसलिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि असावधानी होते ही सांसारिकता का प्रभाव मन पर पड़ जाता है। ठाकुर का स्पष्ट आदेश है—बिना साधना के संसार में मत कूदो। पहले विवेक-वैराग्य जगाओ, फिर संसार में रहो। कच्चे मन से संसार में रहना वैसा ही है जैसा बिना तैरना सीखे गहरे जल में उतर जाना।

2. दूध और पानी का उदाहरण: मन को ‘मक्खन’ बनाना
दूसरा दृष्टांत मन की अवस्था का है। कच्चा दूध पानी में मिल जाए तो उसे अलग करना असंभव है। वैसे ही बिना साधना का मन संसार में मिलकर अपना ईश्वरीय स्वरूप खो देता है। उपाय क्या है? ठाकुर कहते हैं—मन को ‘दही’ जमाओ और ‘मंथन’ यानी विचार-विवेक करो। मंथन से जो ‘मक्खन’ यानी ईश्वर-प्रेम निकलेगा, वह संसार रूपी जल में डालने पर भी नहीं घुलेगा। वह तैरता रहेगा। जिसका मन मक्खन बन गया, वह कमल के पत्ते की तरह संसार में रहकर भी निर्लिप्त रहता है। इसलिए पहले साधना से मन का रूपांतरण करो।

3. चावल और लावे का उदाहरण: पूर्ण शुद्धि की कसौटी
जो भक्त संसार में रहकर भी अत्यंत सावधानी से साधना करते हैं, ठाकुर उनकी तुलना तवे पर भुने चावल से करते हैं। लावा भूनते समय जो दाने तवे से बाहर छिटक जाते हैं, वे पूर्णतः सफेद और शुद्ध रहते हैं। पर जो दाने कड़ाही में ही रह जाते हैं, उनमें आँच के कारण थोड़ा ‘लालपन’ आ ही जाता है। वैसे ही संसार में रहते हुए साधना करने वाले भक्त पर भी थोड़ा-बहुत सांसारिक दोष का रंग चढ़ने की आशंका रहती है। पूर्ण शुद्धि के लिए पूर्ण सावधानी चाहिए। यह दृष्टांत गृहस्थ साधक को प्रमाद से बचने की चेतावनी देता है।

4. सतत सतर्कता: कृपा और प्रार्थना

सब दृष्टांतों का सार यही है कि ईश्वर की कृपा के बिना संसार में विरक्त रहना लगभग असंभव है। माया इतनी प्रबल है कि बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी असावधान होने पर फिसल जाते हैं। इसलिए ठाकुर का अंतिम सूत्र है—निरंतर प्रार्थना और सजगता। भगवान से यही माँगो: ‘हे प्रभु, मुझे अपनी माया से बचाओ। मुझे शक्ति दो कि मैं संसार में रहकर भी तुम्हारा ही बना रहूँ।’

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि ठाकुर का समग्र उपदेश एक ही है—पहले ‘तैयार’ हो, फिर ‘मैदान’ में उतरो। पहले दूध से मक्खन बनो, फिर पानी में रहो। पहले तवे से बाहर छिटको, फिर शुद्ध रहो। घर-परिवार छोड़ना आवश्यक नहीं, मन का घर बदलना आवश्यक है। जब तक देह है, तब तक साधु भी निश्चिंत नहीं। इसलिए अंतिम श्वास तक साधना, सत्संग, विवेक और प्रार्थना का सहारा चाहिए। तभी यह ‘काजल की कोठरी’ रूपी संसार हमें मलिन नहीं कर पाएगा और हमारा जीवन ईश्वर-लाभ करके सफल होगा। यही ठाकुर का गृहस्थों को अभयदान है।

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