800 करोड़ का पुल बना खतरे का पुल – जिम्मेदार कौन
जबलपुर न्यूज़, रिपोर्टर मोहित संघी
जबलपुर में करोड़ों की लागत से बना फ्लाईओवर अब आम जनता की जान पर बन आया है। मंगलवार दोपहर अचानक फ्लाईओवर से कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े गिरने लगे। गनीमत रही कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन यह घटना सीधे तौर पर निर्माण गुणवत्ता और जिम्मेदार एजेंसियों की कार्यशैली पर गंभीर सवा
ल खड़े करती है।
❗ ग्राउंड रिपोर्ट: मौत बनकर गिर रहा कंक्रीट
मौके पर बिखरे भारी-भरकम कंक्रीट के टुकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यह कोई मामूली “डस्ट” या “रूटीन स्लफिंग” नहीं, बल्कि संरचना की गंभीर खामी है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पहले हल्की झड़न हुई और फिर अचानक बड़े हिस्से टूटकर नीचे गिरने लगे। नीचे से गुजर रहे लोगों में दहशत फैल गई।
⚠️ पहले भी उठे थे सवाल, अब हकीकत सामने
यह वही फ्लाईओवर है जिसमें उद्घाटन से पहले ही दरारें सामने आई थीं। उस समय Public Works Department ने इसे “सामान्य एक्सपेंशन” बताकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया था। अब दोबारा कंक्रीट गिरने की घटना ने उस सफाई की पोल खोल दी है।
🛑 अफसरों की दलीलें बनाम जमीनी सच्चाई
विभाग के अधिकारियों ने इस घटना को मौसम या “रूटीन फ्लेकिंग” बताने की कोशिश की, लेकिन जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनमें बड़े और भारी टुकड़े साफ दिख रहे हैं—जिन्हें चार लोग मिलकर भी मुश्किल से उठा पा रहे हैं। सवाल साफ है:
क्या यह “रूटीन” है या सीधी-सीधी लापरवाही?
🏃♂️ कवरेज के बाद हरकत, पहले क्यों नहीं?
मीडिया के मौके पर पहुंचते ही विभाग हरकत में आया और मरम्मत शुरू कर दी गई। यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है—क्या बिना दबाव के कार्रवाई संभव नहीं?
❓ सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदारी किसकी?
फिलहाल विभाग इसे “एक्सपेंशन” बताकर बचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन 800 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की हालत लोगों में डर पैदा कर रही है।
अगर भविष्य में कोई बड़ा हादसा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?—
📢 निष्कर्ष (सीधी बात):
यह घटना सिर्फ एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण है। करोड़ों खर्च करने के बाद भी अगर फ्लाईओवर सुरक्षित नहीं है, तो यह जनता के साथ सीधा धोखा है। अब जरूरत है जवाबदेही तय करने की—न कि बहाने बनाने की।

