
नाहं नाहं’ कहने से निस्तार होता है – स्वामी मुक्तिनाथानंद
प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य के दुःखों का मुख्य कारण अहंकार को माना गया है। जब तक व्यक्ति “मैं” और “मेरा” की भावना में बंधा रहता है, तब तक वह सांसारिक कष्टों, मोह और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता। श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने सरल और प्रभावशाली उपदेशों के माध्यम से यही समझाया कि ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सहज मार्ग अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य अपने अहंभाव के कारण स्वयं को ईश्वर से अलग मानता है। वह अपने ज्ञान, शक्ति और संपत्ति पर गर्व करता है, जिससे उसके भीतर अशांति और दुःख उत्पन्न होते हैं। जब तक “अहम्-मम” अर्थात “मैं और मेरा” का भाव बना रहता है, तब तक मनुष्य सच्चे आनंद और मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का पहला कदम अपने अहंकार को पहचानना और उसे छोड़ने का प्रयास करना है।
स्वामी जी ने कहा कि इस सत्य को समझाने के लिए ठाकुर ने गाय का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण दिया। वे कहते हैं कि जब तक गाय “हम्बा-हम्बा” अर्थात “मैं-मैं” करती रहती है, तब तक उसे अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। किंतु जब उसी के शरीर से बने वाद्ययंत्र से “तू-हूँ, तू-हूँ” की ध्वनि निकलती है, तब उसका अर्थ होता है — “हे प्रभु, सब कुछ तुम ही हो।” यह उदाहरण यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहं को त्यागकर स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी उसके जीवन में शांति और मुक्ति का मार्ग खुलता है। समर्पण का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है। जब भक्त यह समझ लेता है कि ईश्वर ही परम सत्य हैं और वह स्वयं केवल एक माध्यम है, तब उसके भीतर से भय, चिंता और निराशा दूर होने लगती है। जीवन की समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं, लेकिन उन्हें सहने और उनसे संघर्ष करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यही सच्ची शरणागति है। श्री रामकृष्ण ने ज्ञान और भक्ति के अंतर को भी बहुत सरलता से समझाया। ज्ञानी व्यक्ति प्रायः “मैं कौन हूँ” की खोज में लगा रहता है, जबकि भक्त प्रेम और विश्वास के साथ स्वयं को भगवान को अर्पित कर देता है। भक्ति का मार्ग अधिक सहज और सरल है, क्योंकि उसमें हृदय की पवित्रता और प्रेम का महत्व होता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्री रामकृष्ण का संदेश यही है कि मनुष्य यदि अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण का भाव अपनाए, तो उसका जीवन शांत, पवित्र और आनंदमय बन सकता है। यही आध्यात्मिक जीवन का सार और मुक्ति का सच्चा मार्ग है।
प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य के दुःखों का मुख्य कारण अहंकार को माना गया है। जब तक व्यक्ति “मैं” और “मेरा” की भावना में बंधा रहता है, तब तक वह सांसारिक कष्टों, मोह और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता। श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने सरल और प्रभावशाली उपदेशों के माध्यम से यही समझाया कि ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सहज मार्ग अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य अपने अहंभाव के कारण स्वयं को ईश्वर से अलग मानता है। वह अपने ज्ञान, शक्ति और संपत्ति पर गर्व करता है, जिससे उसके भीतर अशांति और दुःख उत्पन्न होते हैं। जब तक “अहम्-मम” अर्थात “मैं और मेरा” का भाव बना रहता है, तब तक मनुष्य सच्चे आनंद और मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का पहला कदम अपने अहंकार को पहचानना और उसे छोड़ने का प्रयास करना है।
स्वामी जी ने कहा कि इस सत्य को समझाने के लिए ठाकुर ने गाय का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण दिया। वे कहते हैं कि जब तक गाय “हम्बा-हम्बा” अर्थात “मैं-मैं” करती रहती है, तब तक उसे अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। किंतु जब उसी के शरीर से बने वाद्ययंत्र से “तू-हूँ, तू-हूँ” की ध्वनि निकलती है, तब उसका अर्थ होता है — “हे प्रभु, सब कुछ तुम ही हो।” यह उदाहरण यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहं को त्यागकर स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी उसके जीवन में शांति और मुक्ति का मार्ग खुलता है। समर्पण का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है। जब भक्त यह समझ लेता है कि ईश्वर ही परम सत्य हैं और वह स्वयं केवल एक माध्यम है, तब उसके भीतर से भय, चिंता और निराशा दूर होने लगती है। जीवन की समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं, लेकिन उन्हें सहने और उनसे संघर्ष करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यही सच्ची शरणागति है। श्री रामकृष्ण ने ज्ञान और भक्ति के अंतर को भी बहुत सरलता से समझाया। ज्ञानी व्यक्ति प्रायः “मैं कौन हूँ” की खोज में लगा रहता है, जबकि भक्त प्रेम और विश्वास के साथ स्वयं को भगवान को अर्पित कर देता है। भक्ति का मार्ग अधिक सहज और सरल है, क्योंकि उसमें हृदय की पवित्रता और प्रेम का महत्व होता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्री रामकृष्ण का संदेश यही है कि मनुष्य यदि अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण का भाव अपनाए, तो उसका जीवन शांत, पवित्र और आनंदमय बन सकता है। यही आध्यात्मिक जीवन का सार और मुक्ति का सच्चा मार्ग है।
प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य के दुःखों का मुख्य कारण अहंकार को माना गया है। जब तक व्यक्ति “मैं” और “मेरा” की भावना में बंधा रहता है, तब तक वह सांसारिक कष्टों, मोह और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता। श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने सरल और प्रभावशाली उपदेशों के माध्यम से यही समझाया कि ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सहज मार्ग अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य अपने अहंभाव के कारण स्वयं को ईश्वर से अलग मानता है। वह अपने ज्ञान, शक्ति और संपत्ति पर गर्व करता है, जिससे उसके भीतर अशांति और दुःख उत्पन्न होते हैं। जब तक “अहम्-मम” अर्थात “मैं और मेरा” का भाव बना रहता है, तब तक मनुष्य सच्चे आनंद और मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का पहला कदम अपने अहंकार को पहचानना और उसे छोड़ने का प्रयास करना है।
स्वामी जी ने कहा कि इस सत्य को समझाने के लिए ठाकुर ने गाय का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण दिया। वे कहते हैं कि जब तक गाय “हम्बा-हम्बा” अर्थात “मैं-मैं” करती रहती है, तब तक उसे अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। किंतु जब उसी के शरीर से बने वाद्ययंत्र से “तू-हूँ, तू-हूँ” की ध्वनि निकलती है, तब उसका अर्थ होता है — “हे प्रभु, सब कुछ तुम ही हो।” यह उदाहरण यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहं को त्यागकर स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी उसके जीवन में शांति और मुक्ति का मार्ग खुलता है। समर्पण का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है। जब भक्त यह समझ लेता है कि ईश्वर ही परम सत्य हैं और वह स्वयं केवल एक माध्यम है, तब उसके भीतर से भय, चिंता और निराशा दूर होने लगती है। जीवन की समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं, लेकिन उन्हें सहने और उनसे संघर्ष करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यही सच्ची शरणागति है। श्री रामकृष्ण ने ज्ञान और भक्ति के अंतर को भी बहुत सरलता से समझाया। ज्ञानी व्यक्ति प्रायः “मैं कौन हूँ” की खोज में लगा रहता है, जबकि भक्त प्रेम और विश्वास के साथ स्वयं को भगवान को अर्पित कर देता है। भक्ति का मार्ग अधिक सहज और सरल है, क्योंकि उसमें हृदय की पवित्रता और प्रेम का महत्व होता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्री रामकृष्ण का संदेश यही है कि मनुष्य यदि अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण का भाव अपनाए, तो उसका जीवन शांत, पवित्र और आनंदमय बन सकता है। यही आध्यात्मिक जीवन का सार और मुक्ति का सच्चा मार्ग है।



