3 करोड़ की लागत से स्वीकृत पुल अब तक अधूरा,
बांस के जुगाड़ से नदी पार कर रहे ग्रामीण; हादसे का खतरा*
*संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव*

छत्तीसगढ़
महासमुंद !
3 करोड़ की लागत से स्वीकृत पुल अब तक अधूरा, बांस के जुगाड़ से नदी पार कर रहे ग्रामीण; हादसे का खतरा*
महासमुंद। महासमुंद से विकास के दावों को आईना दिखाती तस्वीर सामने आई है… बसना के छिर्राबहारा गांव में आज भी ग्रामीणों की जिंदगी बांस और बल्लियों के सहारे चल रही है। उफनती नदी पार करने के लिए ग्रामीणों ने खुद ही जुगाड़ का पुल बना लिया है। सवाल ये है कि जब पुल के लिए 3 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि स्वीकृत है, तो फिर पक्का पुल जमीन पर क्यों नहीं है? ठेकेदार की सुस्ती और सिस्टम की अनदेखी के बीच ग्रामीण हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं।
महासमुंद के बसना विकासखंड की ग्राम पंचायत लम्बर के छिर्राबहारा गांव में करीब 700 की आबादी रहती है। गांव के लोगों के लिए नदी पार करना रोजमर्रा की मजबूरी है। बारिश के दिनों में नदी उफान पर आती है तो मुसीबत और बढ़ जाती है। बच्चों को स्कूल जाना हो… ग्रामीणों को बाजार या अस्पताल पहुंचना हो… रास्ता एक ही है—बांस और बल्लियों से बनाया गया ये खतरनाक जुगाड़। ग्रामीणों ने अपनी मेहनत से नदी पर अस्थायी पुल तो बना लिया, लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक?
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वीओ-क्योंकि सरकारी फाइलों में इस समस्या का समाधान पहले ही निकल चुका है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत यहां 301.68 लाख रुपये, यानी करीब 3 करोड़ 1 लाख रुपये की लागत से 45 मीटर लंबे पुल का निर्माण स्वीकृत है। काम शुरू करने की निर्धारित तारीख थी 1 अप्रैल 2026। लेकिन तारीख बीत गई… महीने गुजर गए… और ग्रामीणों का इंतजार खत्म नहीं हुआ। स्थानीय लोगों के मुताबिक निर्माण कार्य की रफ्तार बेहद धीमी है और अब तक पुल की नींव तक का काम पूरा नहीं हो सका है।
वीओ-एक तरफ 3 करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट… दूसरी तरफ जान हथेली पर रखकर नदी पार करते ग्रामीण। सबसे बड़ा खतरा स्कूली बच्चों के सामने है। बारिश के मौसम में बांस और लकड़ी से बना यह रास्ता कभी भी हादसे की वजह बन सकता है। अगर नदी का जलस्तर बढ़ जाए तो इस जुगाड़ के पुल से गुजरना और भी खतरनाक हो जाता है। ग्रामीणों का सवाल सीधा है—जब पुल स्वीकृत है, पैसा स्वीकृत है और निर्माण की तारीख भी तय है… तो फिर पुल कब बनेगा?
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अब सवाल सिर्फ पुल बनने में देरी का नहीं… बल्कि जिम्मेदारी तय होने का है। क्या निर्माण एजेंसी ठेकेदार की धीमी रफ्तार पर कार्रवाई करेगी? क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर निर्माण की स्थिति की जांच करेंगे?और सबसे अहम सवाल—क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद जागेगा? तीन करोड़ से ज्यादा की लागत वाला पुल कागजों में मंजूर है, लेकिन जमीन पर ग्रामीण आज भी बांस के पुल पर भरोसा करने को मजबूर हैं। विकास की तस्वीर तब पूरी होगी, जब फाइलों में स्वीकृत पुल जमीन पर खड़ा होगा और ग्रामीणों को इस खतरनाक जुगाड़ से आजादी मिलेगी।
