*पुलिस को रखना होगा गवाह के बयान का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड
हाईकोर्ट ने दिए निर्देश*

*पुलिस को रखना होगा गवाह के बयान का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड
हाईकोर्ट ने दिए निर्देश*
*संवाददाता संगीता सिंह राजनांदगांव*
प्रयागराज। High Court Order: उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की जांच को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए उनकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को जरूरी कदम उठाने और सभी जांच अधिकारियों को संबंधित दिशा-निर्देशों की जानकारी देने को कहा है।
BNSS में रिकॉर्डिंग की व्यवस्था
कई मामलों में रिकॉर्डिंग नहीं होने पर जताई चिंता
रेप पीड़िता के बयान की रिकॉर्डिंग का अलग प्रावधान
जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर
यह निर्देश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने आगरा से जुड़े दहेज के एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई के दौरान मामले के जांच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि पहली शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई थी। जांच अधिकारी ने अपनी इस चूक के लिए अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी भी मांगी।
BNSS में रिकॉर्डिंग की व्यवस्था
अदालत ने सुनवाई के दौरान BNSS की धारा 180(3) और BNSS नियम 20(1) का उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान पुलिस अधिकारी को गवाहों के बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड करने की सुविधा उपलब्ध है। यानी जांच प्रक्रिया में इस तकनीक के इस्तेमाल का कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद है।
अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश के DGP की ओर से जारी किए गए 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 के सर्कुलर का भी संज्ञान लिया। इन निर्देशों में गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग से संबंधित प्रावधान और दिशा-निर्देश बताए गए हैं।
कई मामलों में रिकॉर्डिंग नहीं होने पर जताई चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें जांच अधिकारियों ने गवाहों के बयान दर्ज करते समय ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की। अदालत ने यह बात भी रेखांकित की कि पुलिस विभाग की ओर से इस संबंध में पहले ही दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
कोर्ट के सामने यह भी बात आई कि कुछ जांच अधिकारी उपलब्ध विकल्प का इस्तेमाल नहीं करते। अदालत के अनुसार, इससे बाद में गवाह के बयान को लेकर विवाद या सवाल खड़े हो सकते हैं। कई मामलों में यह आरोप भी लगाया जा सकता है कि बयान जांच अधिकारी ने अपनी ओर से तैयार किया या FIR में दर्ज तथ्यों को ही बयान के रूप में दोहरा दिया गया।
रेप पीड़िता के बयान की रिकॉर्डिंग का अलग प्रावधान
अदालत ने DGP के सर्कुलर नंबर 24/2025 का भी उल्लेख किया। इसके तहत रेप पीड़िता का बयान दर्ज करते समय ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग का प्रावधान अनिवार्य किया गया है। वहीं BNSS की धारा 180 के तहत अन्य गवाहों के बयान की रिकॉर्डिंग को वैकल्पिक रखा गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस वैकल्पिक व्यवस्था का कुछ जांच अधिकारियों द्वारा उचित तरीके से इस्तेमाल नहीं किए जाने की स्थिति सामने आई है। इसी को देखते हुए अदालत ने DGP को सभी गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने की संभावना पर विचार करने का निर्देश दिया।
जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को निर्देश दिया कि सभी जांच अधिकारियों तक इन दिशा-निर्देशों की जानकारी पहुंचाई जाए और नियमों के पालन के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं। अदालत ने कहा कि आपराधिक जांच का उद्देश्य वास्तविक आरोपी तक पहुंचना और उसे कानून के सामने लाना होना चाहिए। साथ ही किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत या त्रुटिपूर्ण जांच के कारण परेशानी नहीं होनी चाहिए।
यह निर्देश चंद्रकांत की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। मामला आगरा जिले से संबंधित दहेज प्रकरण का है। हाईकोर्ट के इस निर्देश का उद्देश्य जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना और गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले विवादों को कम करने की दिशा में कदम उठाना है।


