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श्रीरामचन्द्र  का जन्म धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए हुआ – स्वामी मुक्तिनाथानंद

रविवार को अपने साप्ताहिक  प्रवचन में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया श्रीरामचन्द्र का जीवन हमें सत्य, धर्म, कर्तव्य और मर्यादा पालन सिखाता है

अमित चावला /लखनऊ.

लखनऊ.रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने रामकृष्णवचनामृत पर अपने रविवार के प्रवचन के दौरान कहा कि श्रीराम और सीता का जीवन भारतीय संस्कृति और धर्म का आधार माना जाता है। श्रीराम की जन्म कथा अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायक है। अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी, तब उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया। उस यज्ञ के फलस्वरूप श्रीराम का जन्म हुआ, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। उनका जन्म धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए हुआ था।
स्वामी जी ने कहा कि श्रीराम के जन्म का मुख्य उद्देश्य राक्षसों के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त करना और धर्म की पुनः स्थापना करना था। विशेष रूप से रावण जैसे अहंकारी और शक्तिशाली राक्षस का विनाश करना उनके अवतार का प्रमुख कारण था। श्रीराम ने अपने जीवन में आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और आदर्श राजा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि सीता जी की जन्म कथा भी उतनी ही अद्भुत है। सीता का जन्म मिथिला के राजा जनक को खेत में हल चलाते समय धरती से प्राप्त हुआ। इसलिए उन्हें “भूमि पुत्री” कहा जाता है। सीता त्याग, पवित्रता और नारी शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं।
स्वामी जी ने आगे बताया कि श्रीराम के जन्म से हमें अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि हमें सदैव सत्य, धर्म और मर्यादा का पालन करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य और संयम नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए वनवास स्वीकार किया, जो आज भी त्याग और कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने विश्लेषण करते हुए बताया कि इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद ने भी अपने जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने गरीबी, सामाजिक बाधाओं और आलोचनाओं के बावजूद अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उन्होंने विश्व को भारतीय संस्कृति और वेदांत का संदेश दिया और युवाओं को आत्मविश्वास और साहस का मार्ग दिखाया।

  निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि श्रीरामचन्द्र और स्वामी विवेकानंद दोनों ही हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, हमें अपने धर्म, कर्तव्य और आदर्शों से कभी नहीं हटना चाहिए। उनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है कि सच्चाई, धैर्य और परिश्रम से हम किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

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