अक्षय तृतीया सत्कर्म, सेवा और साधना के बीज बोने का पवित्र अवसर है- स्वामी मुक्तिनाथानन्द
अमित चावला /लखनऊ.

रामकृष्ण मठ, निराला नगर, लखनऊ में श्री श्री अक्षय तृतीया पूजा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ रामकृष्ण मंदिर में मनाई गई। इस अवसर पर स्वामी मुक्तिनाथानन्द जी महाराज ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन किए गए समस्त शुभ कार्यों का अक्षय (अविनाशी) फल प्राप्त होता है, इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
कार्यक्रम की शुरुआत मंगल आरती के पश्चात वैदिक मंत्रोच्चारण, पूजा-अर्चना एवं श्रीमद्भगवद्गीता पाठ के साथ हुई, जिसे रामकृष्ण मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द जी ने संपन्न किया। प्रातः स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज द्वारा ऑनलाइन धार्मिक सत्संग एवं प्रवचन हुआ।
सायंकाल श्री श्री ठाकुर जी की संध्या आरती के पश्चात स्वामी इष्टकृपानन्द जी द्वारा भक्तिगीतों की प्रस्तुति दी गई, जिसमें तबले पर संगत श्री शुभम राज ने की।
तत्पश्चात मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने ‘‘युग सन्धि अक्षय तृतीया : कर्म और धर्म, भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि के बीच एक लौकिक सेतु’’ विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाने वाली एक अत्यंत पावन तिथि है। यह केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं, बल्कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास के बीच एक लौकिक सेतु है, जो कर्म और धर्म के संतुलन को दर्शाती है।
स्वामी जी ने ज्योतिषीय दृष्टि से इस दिन की विशेषता बताते हुए कहा कि हिंदू पंचांग का यह एकमात्र ऐसा दिन है जब सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च राशि में स्थित होते हैंकृसूर्य मेष राशि में तथा चंद्रमा वृषभ राशि में। यह दुर्लभ संयोग अधिकतम प्रकाश, संतुलन और चेतना का प्रतीक है।
स्वामी जी ने कहा कि अनेक संत और आध्यात्मिक गुरु इस दिन को आध्यात्मिक बीज बोने का दिन मानते हैं। इस दिन लिए गए संकल्पकृजैसे नियमित जप, दान, सेवा या संयम-दीर्घकालीन आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनते हैं।
‘अक्षय’ का अर्थ है जो कभी क्षय न हो। इस दिन किए गए जप, तप, दान, हवन एवं सत्कर्म का फल अनंत और स्थायी माना गया है।
इस तिथि पर किया गया दान और हवन कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया है। देवताओं एवं पितरों के लिए किया गया कर्म अविनाशी फल प्रदान करता है।
स्वामी जी ने कहा कि अक्षय तृतीया वास्तव में तप, त्याग, संस्कृति और आत्मशुद्धि की पावन सरिता है, जिसमें अवगाहन कर मनुष्य अपने जीवन को पवित्र बना सकता है। यह तिथि हमें सिखाती है कि केवल धर्मानुकूल कर्म ही शाश्वत फल प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित भक्तों के बीच प्रसाद वितरण किया गया।

