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बालक के जैसा त्रिगुणातीत हो जाओ – स्वामी मुक्तिनाथानंद

अमित चावला/ लखनऊ.

साधक को ईश्वर प्राप्ति के लिए बालक जैसा सरल बनाना चाहिए – स्वामी जी

   शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने श्री रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों के आधार पर “कच्चा मैं” और “पक्का मैं” के अंतर को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया है। इस विचार का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अहंकार, आसक्ति और तीनों गुणों—सत्त्व, रज और तम—से ऊपर उठाकर ईश्वर के निकट ले जाना है। इस संदर्भ में पाँच वर्ष के बालक के स्वभाव को त्रिगुणातीत अवस्था का आदर्श उदाहरण माना गया है।
स्वामी जी ने कहा कि “कच्चा मैं” वह अवस्था है जिसमें मनुष्य अपने अहंकार, ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव में बंधा रहता है। इसी कारण वह जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख और मोह-माया के चक्र में फँसा रहता है। इसके विपरीत “पक्का मैं” वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति स्वयं को भगवान का दास, अंश या सेवक मानता है। हनुमान जी इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने जीवन में केवल प्रभु श्रीराम की सेवा और भक्ति को ही महत्व दिया। ज्ञानी महापुरुष भी इसी भाव में स्थित रहते हैं।
स्वामी जी ने समझाया कि बालक को त्रिगुणातीत इसलिए कहा गया है क्योंकि उसका स्वभाव सत्त्व, रज और तम: तीनों गुणों से परे दिखाई देता है। तमोगुण से ऊपर होने का अर्थ है कि उसके मन में द्वेष, क्रोध और बदले की भावना स्थायी रूप से नहीं रहती। बच्चे आपस में लड़ते हैं, परंतु थोड़ी ही देर बाद फिर से मित्र बन जाते हैं। वे पुराने झगड़ों को मन में नहीं रखते। यह गुण मनुष्य को क्षमा और सरलता की शिक्षा देता है। इसी प्रकार बालक रजोगुण से भी परे होता है। बच्चे किसी खिलौने या खेल में पूरी लगन से लगे रहते हैं, परंतु जैसे ही माँ बुलाती है, वे सब कुछ छोड़कर तुरंत उसके पास चले जाते हैं। उनमें वस्तुओं के प्रति गहरी आसक्ति नहीं होती। यह शिक्षा हमें बताती है कि संसार में कर्म करते हुए भी मनुष्य को वस्तुओं और परिणामों के प्रति अत्यधिक मोह नहीं रखना चाहिए। बालक सत्त्वगुण से भी ऊपर माना गया है क्योंकि उसके मन में ऊँच-नीच, जाति-पाँति या सामाजिक भेदभाव की भावना नहीं होती। वह सभी के साथ समान भाव से घुल-मिल जाता है। उसका हृदय निर्मल और निष्कपट होता है। यही समदृष्टि आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण पहचान है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि साधक को ईश्वर प्राप्ति के लिए बालक जैसा सरल, निष्कपट और आसक्तिहीन बनना चाहिए। संसार में रहते हुए भी यदि मनुष्य अपने अहंकार और आसक्ति से ऊपर उठ जाए, तो वह त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त कर सकता है। यही मुक्ति और सच्चे आध्यात्मिक जीवन का मार्ग है।

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