ईश्वर के दर्शन से सब संशय दूर हो जाते हैं – स्वामी मुक्तिनाथानंद
अमित कुमार चावला /लखनऊ.

श्रीरामकृष्ण वचनामृत पर अपने रविवारीय साप्ताहिक प्रवचन में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि श्री रामकृष्ण परमहंस का आध्यात्मिक संदेश मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाता है। वे कहते हैं कि ईश्वर हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। यदि ईश्वर हमारे भीतर हैं, तो फिर प्रश्न उठता है कि हमें हर क्षण ऐसा क्यों अनुभव होता है कि “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ”? मैं ही सोचता हूँ, मैं ही निर्णय लेता हूँ और मैं ही कर्मों का कर्ता हूँ—यह भावना आती कहाँ से है?
स्वामी जी ने आगे बताया कि वास्तव में यही ‘मैं’ और कर्तापन की भावना माया के कारण उत्पन्न होती है। मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर, मन और बुद्धि को ही अपना स्वरूप मान लेता है। परिणामस्वरूप वह प्रत्येक कार्य में अपने को कर्ता समझने लगता है। जबकि शास्त्र हमें बताते हैं कि समस्त जीवों के भीतर परमात्मा ही स्थित हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के इकसठवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“ईश्वरः सर्वभूतानां* *हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि* *यन्त्रारूढानि मायया॥”
अर्थात्, हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं और अपनी माया से सभी प्राणियों को ऐसे घुमा रहे हैं, जैसे वे किसी यंत्र पर आरूढ़ हों।
स्वामी जी ने कहा कि अब प्रश्न उठता है कि यदि ईश्वर ही सबके भीतर स्थित हैं और उनकी माया ही जीवों को चला रही है, तो फिर यह अज्ञान किसने उत्पन्न किया? क्या ईश्वर हमारे साथ खेल रहे हैं? श्री रामकृष्ण इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत सरल और सुंदर ढंग से देते हैं। वे कहते हैं—
इस ‘मैं’ को उन्हीं ने रख छोड़ा है। उनकी क्रीड़ा – उनकी लीला!”
इस बात को समझाने के लिए श्री रामकृष्ण एक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं—
एक राजा के चार लड़के थे। सब थे तो राजा के लड़के, परंतु उन्हीं में कोई मंत्री, कोई कोतवाल, इसी तरह बन-बनकर खेल रहे थे। राजा के लड़के होकर कोतवाल का खेल!”
इस उदाहरण में गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। राजा के सभी लड़के वास्तव में राजा के ही पुत्र हैं, लेकिन खेलते समय कोई स्वयं को मंत्री मान रहा है और कोई कोतवाल। उसी प्रकार हम सभी वास्तव में परमात्मा के ही अंश हैं, परंतु इस संसार-रूपी खेल में अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाते हैं। कोई स्वयं को धनवान मानता है, कोई निर्धन; कोई विद्वान, कोई अज्ञानी; कोई सफल, कोई असफल। लेकिन इन सभी भूमिकाओं के पीछे हमारा वास्तविक स्वरूप एक ही है—ईश्वर से जुड़ा हुआ आत्मस्वरूप।
स्वामी जी ने रोचक ढंग से समझाया फिर प्रश्न है कि इस माया और अज्ञान से मुक्ति कैसे मिले? केवल तर्क, पुस्तकीय ज्ञान या चर्चा से मनुष्य की मूल भ्रांति दूर नहीं होती। श्री रामकृष्ण के अनुसार इसका सर्वोच्च *उपाय है ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन अर्थात् आत्म-साक्षात्कार।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि समस्या यह नहीं है कि ईश्वर हमसे दूर हैं। समस्या यह है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर ‘मैं कर्ता हूँ’ की भावना में बंधे हुए हैं। श्री रामकृष्ण का संदेश हमें याद दिलाता है कि यह संसार ईश्वर की लीला है और हम उसी लीला में अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।


