पारंपरिक खेलों से दूर हो रही नई पीढ़ी, संस्कार और पर्यावरण संरक्षण पर भी हुआ मंथन
सनावद। जीवन में खेलों का विशेष महत्व हमेशा से रहा है और आगे भी बना रहेगा। बच्चों के चहुँमुखी विकास के लिए शारीरिक एवं मानसिक खेल अत्यंत आवश्यक हैं। आजकल यह देखा जा रहा है कि बालक-बालिकाओं में नए-नए खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। गली-मोहल्लों में बच्चे स्केटिंग, क्रिकेट, जूडो-कराटे जैसे खेल खेलते नजर आते हैं, वहीं मोबाइल फोन पर इलेक्ट्रॉनिक खेलों का आकर्षण भी तेजी से बढ़ रहा है।
इसी विषय पर बाविसा ब्राह्मण समाज के भक्ति महिला मंडल बीसी ग्रुप द्वारा एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर समाज सेवी मंगला पुजारी ने कहा कि भारत के पारंपरिक खेलों का हमेशा विशेष महत्व रहा है, लेकिन नई पीढ़ी उनसे लगातार दूर होती जा रही है। गिल्ली-डंडा, लट्टू, कंचे, कबड्डी, खो-खो, सितौलिया जैसे खेल अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, जिससे बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है। उन्होंने बताया कि पारंपरिक खेल सस्ते और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते थे, जबकि पाश्चात्य खेल आर्थिक रूप से महंगे साबित हो रहे हैं।उन्होंने यह भी कहा कि जीवन की कठिनाइयों का सामना वही व्यक्ति कर सकता है जिसका सर्वांगीण विकास हुआ हो। खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता और हर परिस्थिति में संघर्ष करते हुए सफलता प्राप्त करता है। इस दौरान शिक्षिका अंकिता त्रिवेदी ने भीषण गर्मी में पक्षियों के लिए पानी और दाना रखने की अपील की। उन्होंने छत, बालकनी या खिड़की पर मिट्टी के सकोरे में स्वच्छ पानी रखने तथा उसे प्रतिदिन बदलने की बात कही। उन्होंने 25 सकोरों का वितरण भी किया और सभी से पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करने का आग्रह किया।
ग्रहणी बाला कानूनगो ने कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। इसलिए संस्कारों की शुरुआत घर से होती है और स्कूल में उनका विकास होता है। उन्होंने नैतिक शिक्षा, अनुशासन, करुणा और सहयोग जैसे मूल्यों को जीवन में अपनाने पर जोर दिया। साथ ही बच्चों को रामायण, भगवद गीता और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों से जोड़ने की बात कही।
शिक्षिका मोना व्यास ने कहा कि पुस्तकें केवल कागज नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुभव का खजाना होती हैं। वे हमें प्रेरित करती हैं और हमारे व्यक्तित्व का विकास करती हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तकें हमारे सच्चे मित्र होती हैं और ज्ञान बांटने से बढ़ता है।
शिक्षिका समता दुबे ने जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि जल का बुद्धिमानी से उपयोग और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने वर्षा जल संचयन और ड्रिप सिंचाई अपनाने की सलाह दी, क्योंकि जल के बिना जीवन संभव नहीं है।
गोष्ठी में साधना कानूनगो और दीपा दुबे ने भी पर्यावरण संरक्षण, वन्य एवं जलीय जीव-जंतुओं तथा प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण पर अपने विचार व्यक्त किए।इस अवसर पर पुष्पा त्रिवेदी, बंटी कानूनगो, आभा कानूनगो, मालिनी दुबे, सोनू शर्मा, ज्योति शर्मा, रेखा जोशी, संगीता जायसवाल, शिवानी कनपुरिया सहित बड़ी संख्या में सदस्य उपस्थित रहे।


