पुनर्योजी कृषि से खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता को मिलेगा बल : पद्मश्री प्रो. अरविंद कुमार

भरतपुर । देश में खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने तथा तिलहन उत्पादन को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने के उद्देश्य से भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर ने सॉलिडेरिडाड एवं सोसायटी फॉर रेपसीड-मस्टर्ड रिसर्च के संयुक्त तत्वावधान में “पुनर्योजी कृषि द्वारा खाद्य तेल आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने” विषय पर एक दिवसीय हितधारक परामर्श बैठक का आयोजन किया। कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, कृषि वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, विभिन्न सरकारी विभागों, वित्तीय संस्थानों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) तथा प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर खाद्य तेल आपूर्ति श्रृंखला के लिए रणनीति पर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. (डॉ.) अरविंद कुमार, पूर्व कुलपति, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी ने कहा कि पुनर्योजी कृषि केवल एक वैकल्पिक खेती प्रणाली नहीं, बल्कि मृदा स्वास्थ्य सुधारने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आय बढ़ाने की दीर्घकालिक रणनीति है। उन्होंने जलवायु-अनुकूल एवं संसाधन-संरक्षण आधारित कृषि तकनीकों के व्यापक प्रसार के लिए अनुसंधान संस्थानों, उद्योग, प्रसार तंत्र एवं नीति-निर्माताओं के बीच मजबूत समन्वय पर बल दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एस.के. झा ने कहा कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए पुनर्योजी कृषि तकनीकों का तेजी से प्रसार तथा विभिन्न संस्थाओं के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है। उन्होंने अनुसंधान, प्रसार तंत्र और किसानों के बीच मजबूत सहभागिता को तिलहन क्षेत्र की सतत प्रगति का आधार बताया। विशिष्ट अतिथियों के रूप में राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के निदेशक डॉ. के.एच. सिंह, भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के निदेशक डॉ. आर.के. माथुर तथा सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक डॉ. बी.वी. मेहता ने अपने विचार व्यक्त किए।
संस्थान के निदेशक डॉ. वी.वी. सिंह ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारत की पोषण, कृषि एवं आर्थिक सुरक्षा के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए पुनर्योजी कृषि, उन्नत तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण बीज, प्रभावी प्रसार तंत्र, मजबूत बाजार व्यवस्था तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर आधारित समेकित प्रयास आवश्यक हैं।
सॉलिडेरिडाड के कार्यक्रम प्रमुख (वेजिटेबल ऑयल) डॉ. सुरेश मोटवानी ने कहा कि अनुसंधान संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, उद्योग एवं किसानों के समन्वित प्रयासों से ही टिकाऊ खाद्य तेल मूल्य श्रृंखला विकसित की जा सकती है। तकनीकी सत्रों में पुनर्योजी कृषि, नीति समर्थन, अनुसंधान, संस्थागत समन्वय एवं मूल्य श्रृंखला सुदृढ़ीकरण पर चर्चा हुई। डॉ. आर.एस. जाट ने पुनर्योजी कृषि की भूमिका पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. डी.एन. पाठक ने खाद्य तेल सुरक्षा के लिए सोयाबीन उत्पादन एवं प्रसंस्करण को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया।
बैठक में विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के विशेषज्ञों ने गुणवत्तापूर्ण बीज, तकनीक हस्तांतरण, किसान उत्पादक संगठनों, वित्तीय सहायता, बाजार संपर्क तथा संस्थागत साझेदारी को टिकाऊ तिलहन उत्पादन की आधारशिला बताया। परामर्श के अंत में तिलहन उत्पादकता बढ़ाने, पुनर्योजी कृषि को प्रोत्साहन देने तथा खाद्य तेल मूल्य श्रृंखला को मजबूत बनाने के लिए साझा कार्ययोजना पर सहमति बनी। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. अशोक कुमार शर्मा एवं डॉ. विनोद कुमार ने किया एवं तकनीकी सत्रों का सफल संचालन किया।



