सच्ची करुणा मनुष्य को कर्तव्य से विमुख नहीं करती – स्वामी मुक्तिनाथानंद

श्रीमद्भगवद्गीता पर अपने साप्ताहिक प्रवचन स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने भक्तों को बताया उचित मार्ग
श्रीमद्भगवद्गीता पर अपने प्रवचन में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि महाभारत का युद्ध मात्र राज्यों का संघर्ष नहीं था, वह धर्म और अधर्म के बीच का अंतिम निर्णय था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर जब दोनों ओर की सेनाएं शंखनाद के साथ खड़ी थीं, तब अर्जुन ने सारथी बने श्रीकृष्ण से कहा—“रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलो, मैं देखूँ किनसे मुझे युद्ध करना है।” इसी दिव्य दर्शन से अर्जुन-विषाद योग का आरंभ होता है।
श्लोक 26
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
1. **दृष्टि का परिवर्तन**: शत्रु से संबंधों तक
अब तक अर्जुन के मन में दुर्योधन, दुःशासन आदि ‘अन्यायी’ थे, जिनसे युद्ध करना धर्म था। पर जैसे ही रथ बीच में रुका, अर्जुन की दृष्टि बदली। उसने सामने खड़े लोगों को ‘शत्रु’ की तरह नहीं, ‘संबंधी’ की तरह देखा। पितृतुल्य भीष्म, पूज्य गुरु द्रोणाचार्य, मामा शल्य, भाई दुर्योधन, पुत्र-समान लक्ष्मण, मित्र अश्वत्थामा—एक ही कुटुंब के लोग दो भागों में बँटे थे।
‘सेनयोरुभयोरपि’ शब्द बहुत मार्मिक है। अर्जुन ने केवल कौरव पक्ष में नहीं, पांडव पक्ष में भी अपने ही बंधु-बांधव देखे। यह युद्ध राष्ट्र बनाम राष्ट्र नहीं, परिवार का आत्म-हनन था। जब युद्ध अपनों से हो, तो तलवार उठाने से पहले आत्मा काँपती है।
2. **करुणा या मोह?** ‘
अर्जुन ‘अत्यंत करुणा’ से भर गया। सुनने में यह करुणा बहुत उदात्त लगती है। पर गीता की दृष्टि में यह मोह है। सच्ची करुणा मनुष्य को कर्तव्य से विमुख नहीं करती, बल्कि अन्याय के विरुद्ध लड़ने का बल देती है। यहाँ अर्जुन की करुणा उसे युद्ध से हटाना चाहती है।
यह देह-आसक्ति से उपजी ममता है। अर्जुन को ये शरीर ‘मेरे’ लग रहे हैं। वह भूल गया कि वह क्षत्रिय है, जिसका धर्म धर्म की रक्षा करना है, न कि देहों की गिनती करना। भगवान बाद में इसी को ‘हृदय दौर्बल्य’ और ‘कश्मलम्’ कहेंगे—हृदय की दुर्बलता, जो अज्ञान से पैदा होती है।
3. विषाद: गीता-ज्ञान की भूमिका
‘विषीदन् इदमब्रवीत्’—शोक करते हुए बोला। यहीं से गीता शुरू होती है। यदि अर्जुन को विषाद न होता, तो श्रीकृष्ण को गीता कहने की आवश्यकता ही न पड़ती। अर्जुन का यह शोक हर मनुष्य का शोक है। जीवन में जब भी हम धर्म-संकट में पड़ते हैं, जब ‘अपनों’ और ‘कर्तव्य’ में चुनना पड़ता है, तब हमारा गांडीव भी गिरता है।
अर्जुन भाग नहीं रहा। वह रो रहा है, प्रश्न कर रहा है, तर्क दे रहा है। यही उसे ज्ञान का अधिकारी बनाता है। जो अपने मोह को पहचान ले, जो गुरु के सामने अपना भ्रम रख दे, वही शिष्य बनता है।
4. अध्याय 1 का संदेश: समस्या को पहचानना
पहला अध्याय ‘अर्जुन-विषाद योग’ कहलाता है। योग का अर्थ जुड़ना है। अर्जुन यहाँ विषाद से जुड़ा है, और यही विषाद उसे कृष्ण से जोड़ेगा। श्रीकृष्ण ने तुरंत उपदेश नहीं दिया। उन्होंने अर्जुन को पूरा बोलने दिया, रोने दिया, टूटने दिया। क्योंकि रोग का निदान तभी संभव है जब रोगी अपने लक्षण साफ-साफ बताए।
मोह कितना आकर्षक रूप लेकर आता है। ‘अपनों को मारकर राज्य का क्या करूँगा’—यह बात नैतिक लगती है, पर जब ‘अपने’ ही अधर्म के पक्षधर हों, तब यह मोह ही है। धर्म व्यक्ति-निष्ठ नहीं, सत्य-निष्ठ होता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि बड़ा से बड़ा योद्धा भी जब रिश्तों के जाल में फँसता है, तो उसका बल क्षीण हो जाता है। पर यही क्षण ईश्वर के अवतरण का क्षण भी है। अर्जुन का विषाद निराशा नहीं, जागरण की पहली सीढ़ी है। आज भी जब हम ‘परिवार क्या कहेगा’, ‘लोग क्या सोचेंगे’ के कारण सत्य के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते, तब हम अर्जुन की स्थिति में होते हैं। गीता का आरंभ यहीं से होता है—अपने विषाद को पहचानो, उसे कृष्ण के सामने रखो। तभी अध्याय 2 का ‘सांख्ययोग’ और अध्याय 18 का ‘मोक्ष-सन्यास योग’ संभव होगा। विषाद के बिना प्रसाद नहीं।

