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संसार में रहते हुए ईश्वर अनुभूति संभव – स्वामी मुक्तिनाथानंद

अमित चावला /लखनऊ

  सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने मनुष्य के जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया —क्या संसार में रहते हुए भी ईश्वर की भक्ति और आंतरिक शांति संभव है? इस प्रश्न का उत्तर संतुलित जीवन, साधना और वैराग्य के माध्यम से दिया गया है। बिना साधना के संसार में रहना अत्यंत कठिन है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि संसार में रहते हुए ‘अनासक्त’ रहना आसान नहीं है। मनुष्य अक्सर मोह, लालच और इच्छाओं में उलझ जाता है, जिससे उसका मन अशांत रहता है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति साधना के माध्यम से अपने मन को स्थिर और शुद्ध बनाए। साधना ही वह मार्ग है जो हमें संसार के बंधनों से मुक्त होकर ईश्वर के निकट ले जाता है।
स्वामी जी ने कहा  इसके साथ ही ‘एकांत वास’ की भी महत्ता है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हमेशा अकेला ही रहे, बल्कि कुछ समय के लिए संसार से दूर होकर आत्मचिंतन और ध्यान में लीन होना चाहिए। एकांत में मन अधिक शांत और केंद्रित होता है, जिससे ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रार्थना गहरी होती है। यह अभ्यास व्यक्ति को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह संसार में रहते हुए भी संतुलित रह सके।
स्वामी जी ने ‘दूध और दही’ का सुंदर उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे दूध में पानी मिलाने पर वह मिल जाता है, लेकिन जब उसी दूध से दही बनाकर मंथन किया जाता है, तो मक्खन निकलता है जो पानी में नहीं डूबता। इसी प्रकार, साधना के बिना मनुष्य संसार में आसानी से डूब जाता है, लेकिन साधना द्वारा जब मन शुद्ध और दृढ़ हो जाता है, तो वह संसार के बीच रहते हुए भी उससे प्रभावित नहीं होता। यह उदाहरण आध्यात्मिक जीवन की गहराई को बहुत सरल तरीके से समझाता है।
स्वामी जी ने कहा कि राजा जनक का उदाहरण भी अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्हें ‘विदेह’ कहा जाता था, क्योंकि वे शरीर के अहंकार से मुक्त थे। वे राजा होते हुए भी अपने कर्तव्यों का पालन करते थे, लेकिन भीतर से पूरी तरह विरक्त थे। यह अवस्था प्राप्त करना आसान नहीं है, और इसके लिए निरंतर अभ्यास, संयम और वैराग्य की आवश्यकता होती है। श्री रामकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि केवल जनक की नकल करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके जैसे बनने के लिए कठोर साधना करनी होगी।

  निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि संसार से भागना समाधान नहीं है, बल्कि उसमें रहते हुए सही दृष्टिकोण और साधना अपनाना आवश्यक है। यदि हम नियमित रूप से ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन करें, तो हम भी संसार में रहते हुए शांति, संतुलन और ईश्वर की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। यही इस उपदेश का सार है।

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