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ईश्वर ही इस संसार का मूल तत्व है – स्वामी मुक्तिनाथानंद

अमित चावला /लखनऊ.

 

श्रीरामकृष्ण वचनामृत पर अपने रविवारीय साप्ताहिक प्रवचन में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्री रामकृष्ण परमहंस भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के महान संत थे। उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर ही समस्त सृष्टि का आधार है। उनका प्रसिद्ध कथन है—The God is everything; there is no separate existence without God.” अर्थात् ईश्वर ही सब कुछ है और ईश्वर के बिना किसी भी वस्तु या प्राणी का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह विचार अद्वैत भावना को व्यक्त करता है, जिसमें समस्त जगत को ईश्वर का ही स्वरूप माना गया है।

स्वामी जी ने बताया कि अपने इस सिद्धांत को समझाने के लिए श्री रामकृष्ण परमहंस ने बेल के फल का अत्यंत सरल और प्रभावशाली उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बेल के फल में तीन भाग होते हैं—खोपड़ा (छिलका), बीज और गूदा। इनमें गूदा फल का मुख्य और उपयोगी भाग माना जाता है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि छिलका और बीज का कोई महत्व नहीं है। वे भी उसी फल के आवश्यक अंग हैं और उनके बिना फल पूर्ण नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार यह संपूर्ण संसार भी एक बेल के फल के समान है। ईश्वर इस संसार का मूल तत्व और सार है, ठीक वैसे ही जैसे बेल का गूदा। संसार में दिखाई देने वाले सभी जीव-जंतु, पेड़-पौधे, पर्वत, नदियां, मनुष्य और समस्त प्रकृति उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति हैं। यद्यपि हम उन्हें अलग-अलग रूपों में देखते हैं, फिर भी उनका वास्तविक आधार ईश्वर ही है। इसलिए संसार और ईश्वर को पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।

स्वामी जी ने कहा कि श्री रामकृष्ण परमहंस का यह दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि हमें संसार का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। अनेक लोग आध्यात्मिकता के नाम पर संसार को मिथ्या या निरर्थक मान लेते हैं, जबकि ठाकुर का संदेश इससे भिन्न है। उनके अनुसार संसार भी ईश्वर की ही रचना और अभिव्यक्ति है। इसलिए इसका सम्मान करना, प्रकृति की रक्षा करना, सभी प्राणियों के प्रति दया और प्रेम रखना तथा निःस्वार्थ भाव से सेवा करना वास्तव में ईश्वर की ही सेवा है। यह शिक्षा हमें समानता और भाईचारे का भी संदेश देती है। जब प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है, तब किसी के साथ घृणा, भेदभाव या अन्याय करना उचित नहीं है।
हमें प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखकर प्रेम, करुणा और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए। यही सच्ची भक्ति और आध्यात्मिकता का मार्ग है।आज के भौतिकवादी युग में, जब मनुष्य धन, पद और स्वार्थ में उलझता जा रहा है, श्री रामकृष्ण परमहंस का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक वस्तु में विद्यमान हैं, तो उसके भीतर अहंकार, द्वेष और लोभ स्वतः कम होने लगेंगे। उसका जीवन अधिक शांत, संतुलित और आनंदमय बन जाएगा।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्री रामकृष्ण परमहंस का बेल के फल का उदाहरण अत्यंत सरल होते हुए भी गहन आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करता है। ईश्वर ही इस संसार का मूल तत्व है और संसार उसी का विस्तार है। इसलिए ईश्वर और संसार को विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के विभिन्न रूपों के रूप में देखना चाहिए। जब मनुष्य इस सत्य को अपने जीवन में स्वीकार कर लेता है, तभी वह वास्तविक ज्ञान, सच्ची भक्ति और आत्मिक शांति को प्राप्त कर सकता है।

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